जी हाँ, मैं ही वह श्यामपट्ट हूँ जिस पर शिक्षक महत्वपूर्ण बातें लिखकर विद्यार्थियों को ज्ञान का प्रकाश देते हैं। एक कुशल कारीगर ने मुझे बड़े प्रेम से तैयार किया था। जब मैं नया-नया बना था, मेरा रूप बड़ा ही आकर्षक था। हर शिक्षक मुझ पर लिखने को उत्सुक रहता था। वह दिन भी आ गया जब गणित के शिक्षक ने मेरे ऊपर पहले सूत्र लिखे – और तभी मुझे लगा कि मेरा जीवन सफल हो गया। हर सुबह लिखे जाने वाले सुभाषितों ने मेरे गौरव को और बढ़ाया।
मेरा इतिहास गुरु-शिष्य परंपरा जितना ही पुराना है। समय के साथ मेरे रूप, रंग और आकार में बदलाव आए हैं। आज मैं लकड़ी, सीमेंट, प्लास्टिक, टिन और डिजिटल रूप में भी पाया जाता हूँ। लेकिन खुशी की बात यह है कि मेरे नाम में कभी कोई बदलाव नहीं हुआ।
मुझ पर लिखे जाने वाले शब्द केवल अक्षर नहीं होते, वे ज्ञान के सूत्र होते हैं, जो शिक्षकों के विचारों से निकलते हैं। मैं शिक्षक और छात्रों के बीच संवाद का माध्यम हूँ।
बिना मेरे कोई कक्षा अधूरी होती है। मैं अपने अस्तित्व के लिए विद्यार्थियों और शिक्षकों का आभारी हूँ – वे ही मुझे महत्त्व देते हैं, और उनकी सेवा करना ही मेरा धर्म है।