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आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के मध्य संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए। - History (इतिहास)

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प्रश्न

आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के मध्य संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।

दीर्घउत्तर

उत्तर

आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों में अनेक विषमताएँ थीं। हालाँकि स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। विशेषकर पुत्रों को जन्म देने वाली माता के प्रति परिजन अधिक स्नेह अभिव्यक्त करते थे। जिसकी कोख से अधिक सुंदर सुशील, वीर, सद्गुण संपन्न, विद्वान पुत्र पैदा होते थे, समाज में उस स्त्री को नि:संदेह अधिक सम्मान से देखा जाता था। समाज में पितृसत्तात्मक परिवारों का प्रचलन था। पितृवंशिकता को ही सभी वर्गों और जातियों में अपनाया जाता था। कुछ विद्वान और इतिहासकार सातवाहनों को इसका अपवाद मानते हैं। उनके अनुसार सातवाहनों में मातृवंशिकता थी क्योंकि इनके राजाओं के नाम के साथ माता के नाम जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, अभिलेखों से सातवाहन राजाओं की कई पीढ़ियों के राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि राजा वसिथि-पुत्त (सामि) सिरि-पुलुमायि राजा गोतमी-पुत्त सामि-सिरि-यन-सातकनि राजा मधारि-पुत्त स्वामी सकसेन राजा हरिति-पुत्त चत्तरपन-सातकनि राजा हरिति-पुत्त विनहुकद चतुकुलानम्द-सातकमनि राजा गोतमी-पुत्त सिरी-विजये-सातकनि इन सभी नामों में राजा की एक जैसी पदवी पर ध्यान दीजिए। इसके अलावा अगले शब्द को भी लक्षित कीजिए जिसका पुत्त से अंत होता है। यह एक प्राकृत शब्द है जिसका

अर्थ ‘पुत्र’ है। गोतमी-पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि स्त्रीवाची नाम हैं। गौतम और वशिष्ट, ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं। यही नहीं, सातवाहन राजशाही परिवारों में राजा और उसकी पत्नी की आकृतियों को प्रायः मूर्तियों के रूप में विभिन्न गुफाओं की दीवारों पर उत्कीर्ण किया जाता था। ये गुफाएँ और प्रतिमाएँ बौद्ध भिक्षुओं को दान में दी जाती थीं। उपनिषद भी समाज में स्त्री-पुरुषों के अच्छे संबंधों के प्रमाण देते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में जो आरंभिक उपनिषदों में से एक है-आचार्यों और शिष्यों की उत्तरोत्तर पीढ़ियों की सूची मिलती है, जिसमें से कई लोगों को उनके मातृनामों से निर्दिष्ट किया गया है। समाज में विवाहिता स्त्रियाँ अपने पति को सम्मान देती थीं और वे प्रायः उनके गोत्र के साथ जुड़ने में कोई आपत्ति नहीं करती थीं। एक ब्राह्मणीय पद्धति जो लगभग 1000 ई०पू० के बाद से प्रचलन में आई, वह लोगों (खासतौर से ब्राह्मणों) को गोत्रों में वर्गीकृत करने की थी। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था।

उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे। गोत्रों के दो नियम महत्त्वूपर्ण थे-विवाह के पश्चात् स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था तथा एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं कर सकते थे। क्या इन नियमों का सामान्यतः अनुसरण होता था, इस बात को जानने के लिए हमें स्त्री और पुरुष नामों का विश्लेषण करना पड़ेगा जो कभी-कभी गोत्रों के नाम से उद्धृत होते थे। हमें कुछ नाम सातवाहनों जैसे प्रबल शासकों के वंश से मिलते हैं। स्त्री को परिवार में माता के रूप में पूरा सम्मान मिले, उसका पति भी यह चाहता था। राज्य परिवारों में स्त्रियाँ दरबारों में उपस्थित होती थीं। कुछ स्त्रियों ने स्वयं भी राज्य किया या संरक्षिका बनीं। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र को परामर्श देती थीं। यह अलग बात है। कि कई बार माता की सलाह बड़ा राजकुमार नहीं मानता था और वह अपने लालच, क्रोध या गलत स्वभाव के कारण अपनी हर इच्छा को पूरा करना चाहता था। कुछ इसी प्रकार का महाभारत में उल्लेख मिलता है कि जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया तो गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की“शांति की संधि करके तुम अपने पिता, मेरा तथा अपने शुभचिंतकों का सम्मान करोगे। जो पुरुष अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, वह पुरुष ही राज्य की देखभाल कर सकता है। लालच और क्रोध एक बुरी बला है।” किंतु दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी। फलतः उसका अंत बहुत ही बुरा हुआ।

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अध्याय 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग - अभ्यास [पृष्ठ ८१]

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एनसीईआरटी History [Hindi] Class 12
अध्याय 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग
अभ्यास | Q 8. | पृष्ठ ८१
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