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प्रश्न
ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अपनाई गई औद्योगिक नीतियों की कमियों की आलोचनात्मक विवेचना करें।
दीर्घउत्तर
उत्तर
- भारत औपनिवेशिक शासनकाल में एक शक्तिशाली औद्योगिक ढाँचे का विकास नहीं कर सका। यह निम्न तथ्यों के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है
- समान गुणवत्ता के किसी भी विकल्प के बिना हस्तकला उद्योग में गिरावट-ब्रिटेन का एकमात्र उद्देश्य सस्ती से सस्ती कीमतों पर भारत से कच्चा माल प्राप्त करना तथा भारत में ब्रिटेन से आया उत्पादित माल बेचना था। भारतीय हस्तशिल्प वस्तुओं की ब्रिटेन की मशीनों द्वारा बनाई गई वस्तुओं की तुलना में विदेशों में एक बेहतर प्रतिष्ठा थी इसलिए उन्होंने नीतिगत रीति से आयात को शुल्क मुक्त तथा हस्तशिल्प के निर्यात पर उच्च कर लगाकर भारतीय हस्तशिल्प उद्योग को बर्बाद कर दिया। उन्होंने इन नीतियों से बेरोजगारी, मानवीय पीड़ा या आर्थिक वृद्धि की दर पर होने वाले प्रभाव के प्रति कोई विचार नहीं किया।
- आधुनिक उद्योग का अभाव-भारत में आधुनिक उद्योग उन्नीसवीं सदी के दूसरे छमाही के दौरान विकसित होना शुरू हुआ। परंतु इसकी विकास दर बहुत धीमी और अवरुद्ध पूर्ण थी। औपनिवेशिक काल के अंत तक उद्योग और प्रौद्योगिक का स्तर निम्न रहा। उन्नीसवीं सदी के दौरान औद्योगिक विकास कपास और जूट कपड़ा मिलों तक ही सीमित था। लौह और इस्पात उद्योग 1907 में आया जबकि चीनी, सीमेंट और कागज़ उद्योग 1930 के दशक में विकसित हुए।
- पूँजीगत उद्योग को अभाव-भारत में मुश्किल से ही कोई पूँजीगत उद्योग थे जो आधुनिकीकरण को आगे बढ़ावा दे। सकें। 70% संयंत्र तथा मशीनरी का आयात किया जा रहा था। भारत अपनी तकनीकी तथा पूँजीगत वस्तुओं की आवश्यकता के लिए आयात पर निर्भर था।
- व्यावसायिक संरचना-निम्न विकास दर का सूचक: भारतीय अर्थव्यवस्था के अल्प विकसित होने का सबूत इस बात से मिल जाता है कि कार्यशील जनसंख्या का 72% हिस्सा कृषि में संलग्न था और 11.9% औद्योगिक क्षेत्र में संलग्न था। राष्ट्रीय आय में औद्योगिक क्षेत्र का हिस्सा 25.3% था जबकि कृषि का योगदान 57.6% हिस्से का था।
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औद्योगिक क्षेत्रक
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