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प्रश्न
गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
उत्तर
इतिहास के रिकॉर्ड के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने 1930 से लेकर 1931 तक गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया था। पहली गोलमेज वार्ता लंदन में नवंबर, 1930 में आयोजित की गई थी जिसमें देश के प्रमुख नेता शामिल नहीं हुए। इस कारण अंततः यह बैठक निरर्थक साबित हुई। इस गोलमेज की विफलता पर भारतीय इतिहास के विख्यात विद्वान लेखक प्रोफेसर विपिन चंद्र कहते हैं कि-“गाँधी जी लोगों के हृदय पर भगवान राम की तरह उस समय राज करते थे। जब राम ही लंदन में होने वाली सभा में नहीं पहुँचे तो रामलीला कैसे हो सकती थी।” सरकार भी जानती थी कि बिना प्रमुख नेताओं के लंदन में गोलमेज बुलाना निरर्थक होगा। अतः सरकार ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की तैयारी शुरू की। वायसराय लार्ड इर्विन ने जनवरी, 1931 में ही महात्मा गाँधी को जेल से रिहा कर दिया।
अगले ही महीने वायसराय इर्विन के साथ गाँधी जी की कई लंबी बैठकें हुई। इन्हीं बैठकों के बाद गाँधी-इर्विन समझौते पर सहमति बनी जिसकी शर्तों में सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस लेना, सारे कैदियों की रिहाई और तटीय क्षेत्रों में नमक उत्पादन की अनुमति देना आदि शर्ते शामिल थीं। रैडिकल राष्ट्रवादियों ने इस समझौते को द्वितीय गोलमेज की तैयारी के लिए सही वातावरण तैयार करने वाला नहीं मानकर गाँधी जी की भी कटु आलोचना की। क्योंकि ब्रिटिश सरकार से भारतीयों के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का आश्वासन हासिल करने में गाँधी जी विफल रहे थे। यहाँ हमें याद रखना चाहिए कि लाहौर में रावी नदी के किनारे पर हुए वार्षिक अधिवेशन (1929) में कांग्रेस और राष्ट्रवादियों ने पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का लक्ष्य घोषित कर दिया था।
गाँधी जी को इस संभावित और घोषित लक्ष्य प्राप्ति के लिए वार्ताओं का आश्वासन मिला था। वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन को जारी हुए लगभग 46 वर्ष (1885-1931) हो चुके थे। अब लोग पूर्ण स्वतंत्रता का वायदा विदेशी सरकार से चाहते थे। जो भी हो, दूसरा गोलमेज सम्मेलन 1931 के आखिर में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में आयोजित हुआ। उसमें महात्मा गाँधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से प्रतिनिधित्व और नेतृत्व कर रहे थे। गाँधी जी का कहना था कि उनकी पार्टी पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है। इस दावे को तीन पार्टियों ने खुली चुनौती दे दी।
- मुस्लिम लीग को इस संदर्भ में कहना था कि वह भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों के हित में काम करती है।
- भारत के 556 रजवाड़ों का दावा था कि कांग्रेस का उनके नियंत्रण वाले भू-भाग पर कोई अधिकार नहीं है।
- तीसरी चुनौती डॉ० भीमराव अंबेडकर की तरफ से थी, जो बहुत बड़े वकील और विचारक थे।
उन्होंने कहा कि वह दलितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महात्मा गाँधी और कांग्रेस पार्टी देश में तथाकथित दलित समझी और कही जाने ।
वाली नीची जातियों का प्रतिनिधित्व बिलकुल नहीं करते। परिणाम यह हुआ कि हर दल और नेता अपने-अपने पक्ष, विचार, तर्क और माँगें रखते रहे जिसका कुल मिलाकर नतीजा शून्य के रूप में सामने आया। गाँधी जी जैसे ही जहाज से बंबई उतरे तो उन्होंने कहा कि मैं खाली हाथ लौट आया हूँ और सरकार के अड़ियल रवैये के बाद हमें दुबारा से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करना पड़ेगा और उन्होंने ऐसा ही किया।
भारत में नए वायसारय लार्ड विलिंग्डॉन को गाँधी जी से बिलकुल हमदर्दी नहीं थी। उसने एक निजी पत्र में स्पष्ट रूप से इस बात की पुष्टि की थी। विलिंग्डॉन ने लिखा था कि अगर गाँधी न होता तो यह दुनिया वाकई बहुत खूबसूरत होती। वह जो भी कदम उठाता है, उसे ईश्वर की प्रेरणा का परिणाम कहता है, लेकिन असल में उसके पीछे एक गहरी राजनीतिक चाल होती है। देखता हूँ कि अमेरिकी प्रेस उसको गजब का आदमी बताती है। लेकिन सच यह है कि हम निहायत अव्यावहारिक, रहस्यवादी और अंधविश्वासी जनता के बीच रह रहे हैं जो गाँधी को भगवान मान बैठी है…” इसी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन तीसरे और अंतिम चरण में अगस्त, 1933 से 9 महीने तक चलता रहा।
गाँधी जी सहित अनेक प्रमुख नेता बंदी बना लिए गए। 1934 में निरुत्साहित जनता को देखकर गाँधी जी ने इस आंदोलन को बंद कर दिया। भारत में जिन दिनों गाँधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया जा रहा था, ब्रिटिश सरकार ने लंदन में तीसरी गोलमेज कांफ्रेंस बुलाई। इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी ने इसमें भाग नहीं लिया। कांग्रेस पार्टी ने भी इस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया। कुछ भारतीय प्रतिनिधि, जो सरकार की हाँ में हाँ मिलाने वाले थे, उन्होंने इस सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन में लिए गए निर्णयों को श्वेत-पत्र (White Paper) के रूप में प्रकाशित किया गया और फिर इसके आधार पर 1935
का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पास किया गया।