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प्रश्न
जाति प्रथा पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर
जाति प्रथा
भारतीय समाज की एक विशेषता है, उसमें शताब्दियों से चली आ रही 'जाति प्रथा'। हमारा समाज, विशेष रूप से हिन्दू समाज, अनेक जातियों में बँटा हुआ है। इसे वर्ण व्यवस्था भी कहा जाता है। इस व्यवस्था का मूल स्वरूप या आधार समाज के लोगों के गुण और कर्म के अनुसार बना है। इसे श्रम-विभाजन का एक प्राचीन रूप माना जा सकता है। सामाजिक जीवन सुचारु रूप से चले, इसके लिए समाज को चार वर्गों में व्यवस्थित किया गया था। शिक्षा कार्य और धार्मिक विश्वासों की व्याख्या करने वाला या ब्राह्मण वर्ग। दूसरा समाज बाहरी सुरक्षा में भाग लेने वाला या क्षत्रिय वर्ग।
इसी प्रकार व्यवसायकर्ता वैश्य और नाना प्रकार के पों. उपयोगी वस्तओं के निर्माण, स्वच्छता और सेवा-कार्यों को सम्भालने वाला वर्ग या चौथा वर्ग। आज जाति व्यवस्था का जो रूप प्रचलित है उसमें जन्म पर आधारित कार्य-विभाजन का रूप ले लिया है। जाति व्यवस्था के कारण समाज के एक बहुत बड़े भाग पर अनेक अन्याय भी होते रहे हैं। शिक्षित, अग्रगामी, सामाजिक न्याय पर सचाई से विचार करने वाले महापुरुषों ने जाति व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप को स्वीकार नहीं किया है।
जन्म से कोई छोटा-बड़ा, छूत-अछूत नहीं होता। कोई पेशा या कार्य हो, इसके बिना समाज का कार्य सुचारु रूप से नहीं चल सकता। अतः प्रत्येक कार्य का सम्मान होना चाहिए। रूप, रंग, जीवन-स्तर और जन्म-जाति के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर, हर नागरिक को धन्धा चुनने और आगे बढ़ने का अधिकार होना चाहिए। तभी समाज में समरसता, एकता और आत्मसम्मान को आदर मिलेगा। देश उन्नति करेगा।
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