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प्रश्न
कौशल से आप क्या समझते हैं? किसी कौशल के अभिगम के कौन -कौन से चरण होते हैं?
उत्तर
- कौशल का स्वरुप -
कौशल को किसी जटिल कार्य को सरलतापूर्वक से और दक्षता से करने की योग्यता के रूप में परिभाषित किया गया है। कार चलाना, हवाई जहाज उड़ाना, समुद्री जहाज चलना, आशुलिपि में लिखना तथा लिखना एवं पढ़ना आदि कौशल के उदाहरण हैं। ये कौशल अनुभव और अभ्यास से सीखे जाते हैं। -
कौशल प्राप्त करने के चरण -
कौशल अधिगम गुणात्मक रूप से भिन्न कई चरणों से गुजरता है। किसी कौशल को सीखने के प्रत्येक क्रमिक प्रयास के साथ, निष्पादन निर्बाध अधिक होता जाता है और निष्पादन करने में प्रयास की आवश्यकता भी कम होती जाती है। दूसरे शब्दों में, निष्पादन अधिक स्वाभाविक या स्वचालित हो जाता है। यह भी देखा गया है कि प्रत्येक चरण में निष्पादन के स्तर में सुधार आता है। सीखने के एक चरण से जब व्यक्ति दूसरे चरण में प्रविष्ट होता है तो इस संक्रमण काल में निष्पादन के स्तर में सुधार रुक जाता है। इस रुके हुए स्तर को निष्पादन पठार कहा जाता है। अगला चरण प्रारंभ होने के पश्चात निष्पादन का स्तर सुधरने लगता है और ऊपर बढ़ना प्रारंभ हो जाता है।
कौशल अर्जन के चरणों के सर्वाधिक प्रभावशाली वर्णनों में एक वर्णन फिट्स नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, कौशल अधिगम की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है - संज्ञानात्मक, साहचर्यात्मक तथा स्वायत्त। प्रत्येक चरण में अलग-अलग प्रकार की मानसिक प्रक्रियाएँ होती है। कौशल अधिगम के संज्ञानात्मक चरण में अधिगमकर्ता को दिए गए निर्देशों को समझना और याद करना पड़ता है। उसे यह भी समझना पड़ता है कि कार्य का निष्पादन किस प्रकार किया जाना है। इस चरण में व्यक्ति को पर्यावरण से मिलने वाले सभी संकेतों, दिए गए निर्देशों की माँग तथा अपनी अनुक्रियाओं के परिणामों को सदा अपनी चेतना में रखना होता है।
कौशल अधिगम का द्वितीय चरण साहचर्यात्मक होता है। इसमें विभिन्न प्रकार की सांवेदिक सूचनाओं अथवा उद्दीपकों को उपयुक्त अनुक्रियाओं से जोड़ना होता है। अभ्यास की मात्रा जैसे -जैसे बढ़ती जाती है त्रुटियों की मात्रा कम होती जाती है। निष्पादन की गुणवत्ता बढ़ती जाती है और किसी अनुक्रिया को करने में लगने वाला समय भी घटता जाता है। यद्यपि निरंतर अभ्यास करते रहने से अधिगमकर्ता त्रुटिहीन बी=निष्पादन करने लगता है तथापि इस चरण में उसे प्राप्त होने वाली समस्त संवेदी सूचनाओं के प्रति सचेत रहना होता है तथा कार्य पर एकाग्रता बनाए रखनी होती है। इसके पश्चात तीसरा चरण यानी स्वायत्त चरण प्रारंभ होता है। इस चरण में निष्पादन में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। साहचर्यात्मक चरण की अवधानिक माँगे कम हो जाती हैं और बाह्य कारकों द्वारा उत्पन्न की गई बाधाएँ घट जाती हैं। अतः में सचेतन प्रयत्न की अल्प माँगों के साथ कौशलपूर्ण निष्पादन स्वचालित प्राप्त कर लेता है।
एक चरण से दूसरे चरण में संक्रमण यह दर्शाता है कि अभ्यास ही कौशल अधिगम का एकमात्र साधन है। अधिगम के लिए निरंतर अभ्यास और प्रयोग करते रहने की आवश्यकता होती है। अभ्यास के बढ़ने के साथ-साथ सुधार की दर धीरे -धीरे बढ़ जाती है और त्रुटिहीन निष्पादन की स्वचालित, कौशल का प्रमाणक बन जाती है। इसी से कहा जाता है कि 'अभ्यास मनुष्य को पूर्ण बनाता है।'