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प्रश्न
कहा जाता है कि प्रशासनिक-तन्त्र के कामकाज में बहुत ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सुझाव के तौर पर कहा जाता है कि ज्यादा-से-ज्यादा स्वायत्त एजेंसियाँ बननी चाहिए जिन्हें मंत्रियों को जवाब न देना पड़े।
क्या आप मानते हैं कि इससे प्रशासन ज्यादा जन-हितैषी होगा?
उत्तर
यह प्रशासन को अधिक लोगों के अनुकूल नहीं बनाएगा क्योंकि यह मनमाने ढंग से कार्य करेगा और इस प्रकार, नियंत्रण और संतुलन के बिना जवाबदेही खो देगा।
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संसदीय कार्यपालिका का अर्थ होता है
निम्नलिखित को सुमेलित करें-
(क) | भारतीय विदेश सेवा | जिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है। |
(ख) | प्रादेशिक लोक सेवा | केंद्रीय सरकार के दफ्तरों में काम करती है जो या तो देश की राजधानी में होते हैं या देश में कहीं और। |
(ग) | अखिल भारतीय सेवाएँ | जिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है, इसमें प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में भी भेजा जा सकता है। |
(घ) | केंद्रीय सेवाएँ | भारत के लिए विदेशों में कार्यरत। |
संसदीय-व्यवस्था ने कार्यपालिका को नियन्त्रण में रखने के लिए विधायिका को बहुत-से अधिकार दिए हैं। कार्यपालिका को नियन्त्रित करना इतना जरूरी क्यों है? आप क्या सोचते हैं?
कहा जाता है कि प्रशासनिक-तन्त्र के कामकाज में बहुत ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सुझाव के तौर पर कहा जाता है कि ज्यादा-से-ज्यादा स्वायत्त एजेंसियाँ बननी चाहिए जिन्हें मंत्रियों को जवाब न देना पड़े।
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नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचन आधारित प्रशासन होना चाहिए। इस विषय पर 200 शब्दों में एक लेख लिखें।