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प्रश्न
किसी एक संस्मरणीय घटना का वर्णन करो।
उत्तर
बात उन दिनों की है जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था। मैं अपने मामा के यहाँ गया था। एक रात मैं अपने मामा के बेटों के साथ खेत में पहुँचा। बातें करते-करते रात के १२ बज गए। चारों तरफ घोर अँधेरा छाया था। तेज हवा चल रही थी। जानवरों की तरह-तरह की आवाजें आ रही थीं। पूरा माहौल डरावना लग रहा था। हमें सामने एक बड़ा-सा जीव अपनी तरफ बुलाता हुआ दिखाई दे रहा था। उस जीव के हाथ हिल रहे थे। हम डर गए। मेरे ममेरे भाई रोने लगे। इस तरह करीब आधा घंटा बीत गया। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगा। जैसे ही मैं उसके पास पहुँचा, तो मैंने देखा एक पेड़ पर कपड़ा लटका हुआ था, जो हवा की वजह से हिल रहा था। जब मैंने उन लोगों के रोते हुए चेहरों को देखा, तो मैं हँसने लगा। बाद में जब मैंने यह बात उन लोगों को बताई तो वे लोग भी हँसने लगे।
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“कोई काम छोटा नहीं। कोई काम गंदा नहीं। कोई भी काम नीचा नहीं। कोई काम असंभव भी नहीं कि व्यक्ति ठान ले और ईश्वर उसकी मदद न करे। शर्त यही है कि वह काम, काम का हो। किसी भी काम के लिए 'असंभव', 'गंदा' या 'नीचा' शब्द मेरे शब्दकोश में नहीं है।'' ऐसी वाणी बोलने वाली मदर टेरेसा को कोढ़ियों की सेवा करते देखकर एक बार एक अमेरिकी महिला ने कहा, “मैं यह कभी नहीं करती।'' मदर टेरेसा के उपरोक्त संक्षिप्त उत्तर से वह महिला शर्म से सिकुड़ गई थी। सचमुच ऐसे कार्य का मूल्य क्या धन से आँका जा सकता है या पैसे देकर किसी की लगन खरीदी जा सकती है ? यह काम तो वही कर सकता है, जो ईश्वरीय आदेश समझकर अपनी लगन इस ओर लगाए हो। जो गरीबों, वंचितों, जरूरतमंदों में ईश्वरीय उपासना का मार्ग देखता हो और दुखी मानवता में उसके दर्शन करता हो। ईसा, गांधी, टेरेसा जैसे परदुखकातर, निर्मल हृदयवाले लोग ही कोढ़ियों और मरणासन्न बीमारों की सेवा कर सकते हैं और 'निर्मल हृदय' जैसी संस्थाओं की स्थापना करते हैं। |