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‘कला के प्रति ईमानदारी ही सच्चे कलाकार की पहचान है।’ इस सुवचन पर अपने विचार लिखिए। - Hindi - Composite [हिंदी - संयुक्त]

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प्रश्न

‘कला के प्रति ईमानदारी ही सच्चे कलाकार की पहचान है।’ इस सुवचन पर अपने विचार लिखिए।

संक्षेप में उत्तर

उत्तर

यह स्पष्टीकरण कथन एक गहरा सत्य श्रेष्ठता और समर्पण की ऊँचाइयों को छूने का आदान-प्रदान करता है। कला एक ऐसा साधन है जिससे कलाकार अपनी भावनाओं, विचारों, और दृष्टिकोणों को साझा करता है, और इसमें ईमानदारी का महत्वपूर्ण स्थान होता है। जब कोई कलाकार स्वयं में होनेवाली छोटी-बड़ी अनुभूति को दूसरों तक पहुँचाता है, तब उसे सुख मिलता है। कला में ईमानदारी से काम करना एक कलाकार की सृष्टि को अनोखा बनाता है। एक सच्चे कलाकार की पहचान उसकी रचनाएं होती हैं, जो समय के साथ बढ़ती हैं और लोगों के दिलों में स्थिरता बनी रहती हैं। एक सच्चा कलाकार कभी किसी को दुख पहुँचाने के लिए कोई रचना नहीं करता है। अधिकांश कलाकार अपने कला में ईमानदारी से काम करने के माध्यम से एक साथ रहते हैं, और यह साझेदारी दर्शकों को उनकी कला से और ज्यादा जुड़ने का मौका देती है। उन्हें यह भी समझ में आता है कि कला सिर्फ रूपांतरण नहीं, बल्कि समाज में बदलाव लाने का एक माध्यम है। जीवन के सच्चे कलाकार को अधिक साधनों की जरूरत नहीं होती। कम संसाधनों और सरल परिस्थितियों के साथ, वह एक आनंदमय अस्तित्व बनाता है। इस प्रकार, कला में ईमानदारी से काम करना सच्चे कलाकार की पहचान बना देता है और उसे आदर्श बनाता है।

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कलाकार
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अध्याय 2.2: कलाकार - स्‍वाध्याय [पृष्ठ ३५]

APPEARS IN

बालभारती Hindi (Composite) - Lokvani Class 10 Maharashtra State Board
अध्याय 2.2 कलाकार
स्‍वाध्याय | Q (७) | पृष्ठ ३५

संबंधित प्रश्न

निम्नलिखित पठित गदयांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

'एक बार एक बहुरूपिये ने साधु का रूप बनाया - सिर पर जटाएँ, नंगे शरीर पर भस्म, माथे पर त्रिपुंड, कमर में लँगोटी। उसके रूप में कहीं कोई कसर नहीं थी और यह संसारत्यागी साधु ही लगता था। उसने नगर से बाहर बड़े-से पेड़ के नीचे अपनी झोंपड़ी तैयार की, बगीचा लगाया और बैठकर तपस्या करने लगा। थीरे-धीरे सारे नगर में यह/समाचार फैलने लगा कि बाहर एक बहुत पहुँचे हुए महात्मा ने आकर डेरा लगाया है। लोग उसके दर्शनों को आने लगे और धीरे-धीरे चारों तरफ साधु का यश फैल गया। सारें दिन उसके यहाँ भीड़ लगी रहती थी। लोग कहते थे कि महात्मा जी के उपदेशों में जादू है और उनके आशीर्वाद से संसार के बड़े से बड़े कष्ट दूर हो जाते हैं। अपनी इस कीर्ति से साधु को कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता और मन-ही-मन वह अपनी सफलता पर मुसकराया करता।

उत्तर लिखिए:

(1) बहुरूपिये का साधु रूप ऐसा था: (2)

  1. माथे पर ______
  2. सिर पर ______
  3. नंगे शरीर पर ______
  4. कमर में ______

(2) (i) निम्नलिखित शब्दों के विलोमार्थक शब्द गद्यांश में से ढूँढ़कर लिखिए:  (1)

  1. महल × ______
  2. असफलता × ______

(ii) निम्नलिखित शब्दों के वचन बदलकर लिखिए: (1)

  1. डेरा - ______
  2. लँगोटी - ______

(3) 'हमें अपने व्यवसाय के प्रति ईमानदार होना चाहिए' 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।  (2)


निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

बहुरूपियों के बारे में हम सब जानते हैं। इन लोगों का पेशा अब समाप्त होता जा रहा है। किसी समय रईसों और अमीरों का मनोरंजन करने वाले बहुरूपिये प्राय: हर नगर में पाए जाते थे। ये कभी धोबी का रूप लेकर आते थे, कभी डाकिए का। हू-बू-हू उसी तरह का व्यवहार करके ये प्राय: लोगों को भ्रम में डाल देते थे। इनकी इसी सफलता से धोखा खा जाने वाला रईस इन्हें इनाम देता था। उसी तरह के बहुरूपिये का एक रूप मैंने राजस्थानी लोककथाओं में सुना था और मुझे वह अभी भी अच्छी तरह याद है।

(1) एक अथवा दो शब्दों में उत्तर लिखिए:

(क) बहुरूपिये प्राय: यहाँ पाए जाते थे - ______

(ख) बहुरूपिये इनका मनोरंजन करते थे - ______

(ग) बहुरूपिये इनका रूप लेते थे - ______

(घ) ये लोगों को प्राय: भ्रम में डालते थे - ______

(2) (च) निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए:

  1. गरीब 
  2. बुरी

(छ) निम्नलिखित शब्दों के वचन परिवर्तन करके लिखिए:

  1. बहुरूपिया
  2. लोककथाएँ

(3) “व्यक्तित्व विकास में कला का महत्व" अपने विचार लिखिए।


निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए-

एक दिन साधु ने देखा कि घोड़ों-ऊँटों और बैलगाड़ियों का झुंड उसकी कुटी की तरफ चलता आ रहा है। मन में संदेह हुआ कि लोगों को उसकी असलियत का पता तो नहीं चल गया और ये सरकार के आदमी उसे पकड़ने चले आ रहे हैं। वह अभी यही सब सोच ही रहा था कि देखा, उस झुंड के आगे-आगे वही सेठ है। सेठ पास आया। उसने साधु को प्रणाम किया। गाड़ियों, घोड़ों, ऊँटों से, सोने-चाँदी के गहनों, मुहरों और जवाहरातों से भरे कलसे उतारे गए। देखते-देखते कुटी के सामने ढेर लग गया। सेठ ने साधु के चरण पकड़कर कहा- “महाराज, आपके उपदेशों से मुझे सच्चा ज्ञान प्राप्त हो गया है और इस संसार से मन फिर गया है। झूठ-कपट से मैंने जो धन कमाया है, वह सब मैं आपके चरणों में रख रहा हूँ।

(1) संजाल पूर्ण कीजिए-   (2)

(2) (i) गद्यांश में प्रयुक्त शब्द युग्म की जोड़ी लिखिए।   (1)

(ii) गद्यांश में प्रस्तुत विलोम शब्द की जोड़ी लिखिए:   (1)

______ × ______

(3) साधु-सन्तों के स्वभाव के बारे में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।   (2)


संजाल पूर्ण कीजिए:


परिणाम लिखिए:

बीमार सेठानी पर धूनी की चुटकी भर राख का -


परिणाम लिखिए:

बहुरूपिये की वास्तविकता जानने के उपरांत सेठ जी की स्थिति -


निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:

बहुरूपिये हू-बू-हू उसी तरह का व्यवहार करके प्रायः लोगों को भ्रम में नहीं डालते थे।


निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:

एक बार सेठ जी बीमार हो गए।


निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:

सेठानी कभी-कभी आने लगी।


निम्नलिखित विधान सही करके लिखिए:

साधु ने झगड़ा करके सेठ को लौटा दिया।


प्रवाह तालिका पूर्ण कीजिए:


निम्नलिखित वाक्यों को घटनाक्रम के अनुसार लिखिए:

  1. सेठ जी द्‍वारा सेठानी को साधु के पास ले जाना।
  2. बहुरूपिये का साधु का रूप लेना।
  3. सेठानी का बीमार होना।
  4. धीरे-धीरे सेठानी की तबियत सुधरना।

‘सहयोग से कठिन कार्य की पूर्ति होती है’ विषय पर अपने विचार शब्‍दांकित कीजिए।


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