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क्या एक प्रकार्य वाले नगर की कल्पना की जा सकती है? नगर बहुप्रकार्यात्मक क्यों हो जाते हैं? - Geography (भूगोल)

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प्रश्न

क्या एक प्रकार्य वाले नगर की कल्पना की जा सकती है? नगर बहुप्रकार्यात्मक क्यों हो जाते हैं?

दीर्घउत्तर

उत्तर

नगर अपने प्रकार्यों में स्थिर नहीं हैं। उनके गतिशील स्वभाव के कारण विशेषीकृत नगरों के प्रकार्यों में परिवर्तन हो जाता है तथा वे लोगों को अनेक सेवाएँ प्रदान करने वाले आर्थिक नोड़ (node) के रूप में कार्य करते हैं। अतः वर्तमान समय में एक प्रकार्य वाले नगर की कल्पना नहीं की जा सकती। तेजी से बढ़ती जनसंख्या तथा लोगों की इच्छाओं व आकांक्षाओं को संतुष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नगरों को महानगर तथा उसके बाद मेगानगर बनने में अधिक समय नहीं लगता है। 20वीं शताब्दी के दौरान भारत में नगरीय जनसंख्या 11 गुना बढ़ी है। भारत की 60 प्रतिशत नगरीय जनसंख्या प्रथम श्रेणी के नगरों में रहती है तथा कुल नगरीय जनसंख्या का 21 प्रतिशत भारत के छः मेगानगरों में निवास करती है। लोगों की आवश्यकताएँ बढ़ने पर विशेषीकृत नगर भी महानगर तथा उसके बाद मेगानगर (नगरीय संकुल) बनने पर बहुप्रकार्यात्मक बन जाते हैं जहाँ उद्योग, वाणिज्य, व्यवसाय, प्रशासन, परिवहन तथा अन्य प्रकार की उच्चस्तरीय सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं। प्रकार्य इतने अंतर्ग्रथित हो जाते हैं कि नगर को किसी विशेष प्रकार्य वर्ग में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। बल्कि नगर के क्षेत्र विशेष किसी विशेष प्रकार्य के लिए जाने जाने लगते हैं, जैसे दिल्ली में नेहरू प्लेस-कम्प्यूटर के लिए, भागीरथ प्लेस-इलैक्ट्रीकल सामान के लिए, लाजपतराय मार्केट-इलैक्ट्रोनिक्स सामान के लिए तथा गाँधीनगर-रेडीमेड गारमेंट्स के लिए इत्यादि।

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भारत में नगरीकरण
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अध्याय 4: मानव बस्तियाँ - अभ्यास [पृष्ठ ३९]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Geography - India: People and Economy [Hindi] Class 12
अध्याय 4 मानव बस्तियाँ
अभ्यास | Q 3. (ii) | पृष्ठ ३९
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