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प्रश्न
नागमती वियोग खंड पूरा पढ़िए और जायसी के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिये
उत्तर
नागमती विरह-वर्णन में जैसे व्यथा स्वयं ही मुखारित होने लगी है। इसके लिए नागमती के विरह का आधार भी एक कारण है।
नागमती का पतिप्रेम विरहावस्था में प्रगाढतर हो गया। संयोग-सुख के समान उसने विरह का भी अभिनन्दन किया। स्मृतियों के सहारे, पति के प्रत्यागमन की आशा में उसने पथ पर पलकें बिछा दीं।
किन्तु निर्मोही लौटा नहीं। एक वर्ष व्यतीत हो गया, प्रवास आजीवन प्रवास में बदल न जाए इस आशंका मात्र से ही उसका हृदय टूक-टूक हो गया। जायसी ने उसका चित्रण इस प्रकार किया है-
नागमती चितउरपथ हेरा। पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा।।
नागर काहु नारि बस परा। तेइ मोर पिउ मोसौं हरा।।
सुआ काल होई लेइगा पीऊ। पीउ नहिं जात, जात बरऊ जीऊ।।
सारस जोरी कौन हरि, मारि बियाधा लीन्ह।
झुरि झुरि पंजर हौ भई, विरह काल मोहि दीन्ह।।
विरह व्यथिता नागमती महलों के वैभव, विलास और साज-सज्जा में कोई आकर्षण अनुभव नहीं करती है, उसके लिए प्रकृति का सौैन्दर्य, स्निग्ध कमनीयता, मलयज मोहकता और वासन्ती कौमार्य आदि सभी तत्व कष्टदायक हो जाते हैं।
प्रकृति अपना परिधान बदलती है किन्तु नागमती की विरह-व्यथा तो बढती ही जाती है उसके लिए सारा संसार भयावह लगता है। नागमती की सखियाँ उसे धीरज देने का प्रयास करती हैं, किन्तु सखियों का समझाना भी निरर्थक रह जाता है। इसी स्थल पर जायसी ने बारहमासे का वर्णन किया है।
जायसी ने एक-एक माह के क्रम से नागमती की वियोग-व्यथा का सजीव चित्रण किया है। संयोग के समय जो प्रेम सृष्टि के सम्पूर्ण उपकरणों से आनन्द का संचय करता था, वियोग के क्षणों में वही उससे दुख का सग्रंह करता है।
कवि ने जिन प्राकृतिक उपकरणों और व्यापारों का वर्णन किया है, उनके साहचर्य का अनुभव राजा से लेकर रंक तक सभी करते हैं। उदाहरणस्वरूप कुछ पंक्तियाँ हैं-
चढा असाढ, गगन घन गाजा। साजा बिरह दुन्द दल बाजा।।
घूम, साम, धौरे घन धाए। सेत धजा बग-पाँति देखाए।।
चारों ओर फैली घटाओं को देखकर नागमती पुकारती है-‘ ओनई घटा आइ चहुँ फेरी, कन्त! उबारु मदन हौं घेरी’। उस समय नागमती की मनोदशा का यह चित्र तो अत्यन्त मार्मिक है-
जिन्ह घर कन्ता ते सुखी, तिन्ह गारौ औ गर्ब।
कन्त पियारा बाहिरै, हम सुख भूला सर्व।।
श्रावण में चारों ओर जल ही जल फैल जाता है, नागमती की नाव का नाविक तो सात समुद्र पार था। भादों में उसकी व्यथा और भी बढ जाती है। शरद ऋतु प्रारम्भ हुई, जल कुछ उतरा तो वह प्रियतम के लौटने की प्रार्थना करने लगी। भ्रमर और काग द्वारा पति को संदेश भेजते हुए वह कहती है-
पिउ सौ कहेहु संदेसङा, हे भौंरा! हे काग!
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग।।
किन्तु पति न लौटा, वनस्पतियाँ उल्लासित हो गयीं किन्तु नागमती की उदासीनता बढती ही गयी।