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नारी आंदोलन ने अपने इतिहास के दौरान कौन-कौन से मुख्य मुद्दे उठाए? - Sociology (समाजशास्त्र)

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प्रश्न

नारी आंदोलन ने अपने इतिहास के दौरान कौन-कौन से मुख्य मुद्दे उठाए?

दीर्घउत्तर

उत्तर

विद्वानों तथा समाज सुधारकों ने यह प्रदर्शित किया है। कि स्त्री-पुरुषों के बीच असमानताएँ प्राकृतिक होने के बजाय सामाजिक हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों से संबंधित प्रश्न जोर-शोर से उठाए गए। राजा राममोहन राय ने सामाजिक, धार्मिक दशाओं तथा स्त्रियों की दुरावस्था में सुधार के लिए बंगाल में प्रयास किए। उन्होंने ‘सती प्रथा के विरुद्ध अभियान चलाया। यह पहला ऐसा स्त्रियों से संबंधित मुद्दा था, जो लोगों के ध्यानार्थ लाया गया।

ज्योतिबा फुले एक सामाजिक बहिष्कृत जाति के थे और उन्होंने जातिगत तथा लैंगिक, दोनों ही विषमताओं पर प्रहार किया। उन्होंने सत्य शोधक समाज की स्थापना की, जिसका प्राथमिक उद्देश्य था-सत्य का अन्वेषण। सर सैय्यद अहमद खान ने मुस्लिम समुदाय के कल्याण हेतु कदम उठाए। वे लड़कियों को घर की सीमा में रहते हुए ही शिक्षा के हिमायती थे। वे लड़कियों को शिक्षित करना चाहते थे, किंतु धार्मिक सिद्धांतों के दायरे में रहकर ही। वे लड़कियों को घर में स्वतंत्रता तथा गृहकार्य में सुशिक्षित करना चाहते थे। एक महाराष्ट्र की घरेलू महिला ताराबाई शिंदे ने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक किताब लिखी, जिसमें उन्होंने पुरुष प्रधान समाज में अपनाई जा रही दोहरी नीति का प्रतिवाद किया।

स्त्रियों के मुद्दे प्रभावकारी रूप में सत्तर के दशक में सामने आए। स्त्रियों से संबंधित ज्वलंत मुद्दों में पुलिस कस्टडी में महिलाओं के साथ बलात्कार, दहेज हत्याएँ तथा लैंगिक असमानता इत्यादि प्रमुख थे। इधर नई चुनौतियाँ लड़कियों के जन्मदर में अत्यधिक कमी के रूप में सामने आई हैं, जो सामाजिक विभेद का द्योतक है।

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स्त्रियों की समानता और अधिकारों के लिए संघर्ष
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अध्याय 5: सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप - प्रश्नावली [पृष्ठ ११७]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Sociology [Hindi] Class 12
अध्याय 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप
प्रश्नावली | Q 10. | पृष्ठ ११७
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