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प्रश्न
निम्नलिखित दिए गए शीर्षक पर लगभग 150 से 200 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए:
आत्मसंयम
उत्तर
आत्मसंयम
आत्मसंयम का सहज और सरल अर्थ है अपने आप पर, अपने मन पर नियंत्रण।
संयम जीवन सारथी, जीवन रथ पुरुषार्थ
धीर वीर नित संयमित, विजयी समझो सार्थ।।
इसका शाब्दिक अर्थ जितना आसान लगता है, वास्तविक जीवन में इसे लागू करना और आत्मसात करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। शांत, क्षमाशील, उदार और स्थिर मन वाला व्यक्ति ही अधिकतम कार्य कर सकता है। इसे आत्म-संयम कहा जाता है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में विस्तार से समझाया गया है। यदि व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रखता है, तो योग की प्राप्ति कठिन हो जाती है। मन स्वभाव से चंचल और अस्थिर होता है, लेकिन जो योगी इसे शांत कर लेता है, वह सर्वोत्तम सुख का अनुभव करता है। आत्मा को प्रलोभनों से बचाना ही आत्म-संयम है। इसे प्राप्त करने के लिए मन की इच्छाओं पर पकड़ और विचारधारा को स्थिर बनाए रखना आवश्यक है। आत्म-संयम के माध्यम से न केवल हम स्वयं को विकसित करते हैं, बल्कि नैतिक रूप से भी उन्नति करते हैं। इस प्रकार आत्म-संयम केवल व्यक्तिगत कार्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उससे परे जाकर सामाजिक संसार में आदान-प्रदान का माध्यम बनता है।
किसी से अपेक्षा रखना स्वयं को उपहास, दयनीयता, तिरस्कार और घृणा का पात्र बनाना है। इस स्थिति में लोग आश्रित और परजीवी बन जाते हैं। आत्म-शक्ति से संपन्न व्यक्तियों के बीच हमारी स्थिति दयनीय हो जाती है। आत्म-विश्वासी व्यक्ति इसके विपरीत साहसी और दृढ़निश्चयी होता है। ऐसा व्यक्ति अपने प्रयासों के साथ-साथ ईश्वर की सहायता पर भी विश्वास करता है। वह दूसरों की सहायता पर निर्भर नहीं होता, समस्याओं से लड़ता है और हर कदम पर नए अनुभव प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति कमजोर और पिछड़े वर्ग को मानसिक दृढ़ता, सहनशीलता और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाते हैं।