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प्रश्न
निषेधात्मक संवेगों का प्रबंधन क्यों महत्वपूर्ण है ?
उत्तर
कोई ऐसा दिन जीने का प्रयास कीजिए जब आपने किसी संवेग का अनुभव न किया हो। आप शीघ्र ही समझ जाएँगे कि ऐसे जीवन की कल्पना करना ही कठिन है जिसमें संवेग न हों। संवेग हमारे दैनिक जीवन तथा अस्तित्व के अंश हैं। वे हमारे जीवन के ताने-बाने तथा अंतर्वैयक्तिक संबंधों को बनाते हैं।
संवेग एक सांतत्यक के अंश हैं। किसी संवेग को अनेक तीब्रताओं पर अनुभव किया जा सकता है। आप थोड़ी-सी प्रसन्तता या उल्लास का, थोड़ा विचार-मग्नता या शोकाकुलता का अनुभव कर सकते हैं। यद्यपि हममें से अधिकांश लोग संवेगों में संतुलग बनाए रखने में सफल होते हैं।
जब दुंद्वात्मक परिस्थिति होती है तो व्यक्ति उसके साथ समायोजन करने का प्रयास करते हैं तथा सामना करने के लिए या तो कार्योन्मुख या रक्षा-उन्मुख उपाय अपनाते हैं। ये समायोजी उपाय उन्हें कुछ असामान्य संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं; जैसे- दुश्चिंता, अवसाद इत्यादि को करने से रोकते हैं। दुश्चिंता (anxiety) वह दशा है जो व्यक्ति उपयुक्त अहं रक्षा को न अपनाने के कारण हुई असफलता की स्थिति में विकसित कर लेता है। उदाहरण के लिए, यदि व्यक्ति अपने किसी अनैतिक कार्य (जैसे- नकल या धोखाधड़ी या चोरी करना) को तर्कसंगत 'ठहराने के रक्षा उपाय में असफल हो जाता है, तो वह इस कार्य के परिणामों के बारे में तीव्र आशंका से ग्रस्त हो जाता है। दुश्चिंतित व्यक्तियों को ध्यान केंद्रित करने में तथा तुच्छ विषय पर भी निर्णय लेने में अत्यंत कठिनाई का अनुभव होता है।
अवसाद की स्थिति, व्यक्ति के तर्कसंगत सोचने को, वास्तविकता का अनुभव करने की तथा सक्षम रूप से कार्य 'करने की योग्यता पर विषम प्रभाव डालती है। वह व्यक्ति की 'मनोदशा को पूर्णतः अभिभूत कर देती है। अवसाद क्योंकि दैनिक जीवन में हम अक्सर दुंद्वात्मक परिस्थितियों का सामना करते हैं। कठिन और दबावमय परिस्थितियों में किसी व्यक्ति में बहुत से निषेधात्मक संवेग; जैसे- भय, दुश्चिंता, विरुचि इत्यादि विकसित हो जाते हैं। यदि इस प्रकार के निषेधात्मक संवेगों को लंबे समय तक चलते रहने दिया जाए, तो वे व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डाल सकते हैं। यही कारण है कि अधिकांश दबाव प्रबंधन के कार्यक्रम, संवेगों के प्रबंधन को दबाव प्रबंधन के लिए आवश्यक मानते हैं। संवेग प्रबंधन का फोकस निषेधात्मक संवेगों में कमी तथा विध्यात्मक सवेगों में वृद्धि करने पर होता है।
यद्यपि अधिकांश शोधकर्ताओं का फोकस निषेधात्मक संवेगों; जैसे- क्रोध, भय, दुश्चिंता इत्यादि रहा है किंतु निकट समय में “विध्यात्मक मनोविज्ञान' के क्षेत्र ने उत्कर्ष हासिल किया है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, विध्यात्मक मनोविज्ञान का सरोकार उन विशेषताओं के अध्ययन से है जो जीवन को वैभवशाली बनाती हैं; जैसे- भरोसा, प्रसन्नता, सर्जनात्मकता, साहस, आशावादिता, उल्लास इत्यादि।