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पेट ही पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सत्य है। भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच - Hindi (Core)

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प्रश्न

पेट ही पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सत्य है। भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच डालने की हृदय-विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें।
संक्षेप में उत्तर

उत्तर

यदि प्रस्तुत पंक्ति को पढ़े तो पाएंगे कि किसानों में गरीबों की स्थिति तब से लेकर अब तक नहीं बदली है। पहले भी किसान प्रकृति की मार से बेबस था, आज भी प्रकृति की मार से बेबस है। किसान कितनी भी मेहनत करे, उसकी मेहनत प्रकृति पर निर्भर करती है। यदि प्रकृति उस पर मेहरबान है, तो वह कुछ समय के भोजन का इंतज़ाम कर सकता है लेकिन प्रकृति ज़रा-सी नाराज़ हो गई, तो उसकी मेहनत का नाश होने में कुछ पल नहीं लगते हैं। इस कारण उसे महाजन या सरकार से कर्ज़ उठाना पड़ता है। यदि कर्ज़ ले लिया, तो यह तय है कि उसका सर्वनाश निश्चित है। भूख और गरीबी से बेबस या तो वह मौत को गले से लगा लेता है या फिर अपनी संतान को बेचकर कुछ समय के लिए गुज़ारा करने पर विवश हो जाता है। यह स्थिति शायद आने वाले युगों में भी न बदले। हम कितनी तरक्की कर लें। लेकिन इस दिशा में हमारी उपेक्षा साफ अभिलक्षित होती है। किसान को मजबूर होकर इस प्रकार के कदम उठाने पड़ते हैं।
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कवितावली (उत्तर कांड से)
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अध्याय 8: तुलसीदास (कवितावली, लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप) - अभ्यास [पृष्ठ ५२]

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एनसीईआरटी Hindi - Aaroh Class 12
अध्याय 8 तुलसीदास (कवितावली, लक्ष्मण-मूर्च्छा और राम का विलाप)
अभ्यास | Q 2. | पृष्ठ ५२

संबंधित प्रश्न

कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।


तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी?

धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ/ काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?


धूत कहौ ______ वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?


व्याख्या करें-
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।


व्याख्या करें-
ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।


तुलसी के युग की बेकारी के क्या कारण हो सकते हैं? आज की बेकारी की समस्या के कारणों के साथ उसे मिलाकर कक्षा में परिचर्चा करें।

यहाँ कवि तुलसी के दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया- ये पाँच छंद प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार तुलसी साहित्य में और छंद तथा काव्य-रूप आए हैं। ऐसे छंदों व काव्य-रूपों की सूची बनाएँ।

‘कवितावली’ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि तुलसीदास को अपने समय की आर्थिक-सामाजिक समस्याओं की समझ थी।


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