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प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है? - Psychology (मनोविज्ञान)

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प्रश्न

प्राचीन अनुबंधन किस प्रकार साहचर्य द्वारा अधिगम को प्रदर्शित करता है?

दीर्घउत्तर

उत्तर

प्राचीन अनुबंधन के निर्धारक: प्राचीन अनुबंधन में कितनी जल्दी से और कितनी मजबूती से अनुक्रिया प्राप्त होती है, यह अनेक कारकों पर निर्भर करता है। अनुबंधन अनुक्रिया के अधिगम को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं :

  1. उद्दीपकों के बीच समय संबंध :
    प्राचीन अनुबंधन प्रक्रियाँ प्रमुखतः चार प्रकार की होती हैं। इनका आधार अनुर्बोधत उद्दीपक और अननुबंधित उद्दीपक की शुरुवात के बीच समय संबंध पर आधारित होता है। प्रथम तीन प्रक्रियाँ अग्रवर्ती अनुबंधन की हैं तथा चौथी प्रक्रिया पच्चगामी अनुबंधन की है। इन प्रक्रियाओं की मूल प्रायोगिक व्यवस्थाएँ निम्न प्रकार हैं:

    1. जब अनुपंधित तथा अननुबंधित उद्दीपक साथ-साथ प्रस्तुत किए जाते हैं तो इसे सहकालिक अनुबंधन कहा जाता है।
    2. विलंबित अनुबंधन की प्रक्रिया में अनुबंधित उद्दीपक का प्रारंभ अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। अनुबंधित उद्दीपक का अंत भी अननुबंधित उद्दीपक के पहले होता है।
    3. अवशेष अनुबंधन की प्रक्रिया में अनुबंधित उद्दीपक का प्रारंभ और अंत अननुबंधित उद्दीपक से पहले होता है। लेकिन दोनों के बीच में कुछ समय अंतराल होता है।
    4. पच्चगामी अनुबंधन की प्रक्रिया में अनुबंधित उद्दीपक का प्रारंभ अनुबंधित उद्दीपक से पहले शुरू होता है। प्रायोगिक अध्ययनों से स्पष्ट हो चूका है कि विलंबित अनुबंधन की प्रक्रिया अनुबंधित अनुक्रिया प्राप्त करने की सर्वाधित प्रभावशाली विधि है। सहकालिक तथा अवशेष अनुबंधन की प्रक्रियों से भी अनुर्बोधत अनुक्रिया प्राप्त होती है, परंतु इन विधियों में विलंबित अनुबंधन प्रक्रिया की तुलना में अधिक प्रयास लगते हैं। उल्लेखनीय है कि पच्चगामी अनुबंधन प्रक्रिया से अनुक्रिया प्राप्त होने की संभावना बहुत कम होती है।
  2. अननुबंधित उद्दीपकों के प्रकार :
    प्राचीन अनुबंधन के अध्ययनों में प्रयुक्त अननुबंधित उद्दीपक मूलतः दो प्रकार के होते हैं - प्रवृत्यात्मक तथा विमुखी। प्रवृत्यात्मक अननुबंधित स्वतः सुगम्य अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं; जैसे खाना, पीना, दुलारना आदि। ये अनुक्रियाएँ संतोष और प्रसनता प्रदान करती हैं। दूसरी ओर, विमुखी अननुबंधित उद्दीपक जैसे - शोर, कड़वा स्वाद, विद्युत आघात, पीड़ादायी सुई आदि दुखदायी और क्षतिकारक होते हैं। ये परिहार और पलायन की अनुक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं। अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि प्रवृत्यात्मक प्राचीन अनुबंधन अपेक्षाकृत धीमा होता है और इसकी प्राप्ति के लिए अधिक प्रयत्न करने पड़ते हैं जबकि विमुखी प्राचीन अनुबंधन दो-तीन प्रयासों में ही स्थापित हो जाता है। यह वस्तुतः विमुखी अननुबंधित उद्दीपक की तीव्रता पर निर्भर करता है।

  3. अननुबंधित उद्दीपकों की तीव्रता :
    अननुबंधित उद्दीपकों की तीव्रता प्रवृत्यात्मक और विमुखी प्राचीन अनुबंधन दोनों की दिशा को प्रभावित करती है। अनुबंधित उद्दीपक जितना ही अधिक तीव्र होगा, अनुबंधित अनुक्रिया के अर्जन की गति उतनी ही अधिक होगी अर्थात अनुबंधित उद्दीपक जितना अधिक तीव्र होगा, उतने ही कम प्रयासों की जरुरत अनुबंधन की प्राप्ति के लिए पड़ेगी।

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प्राचीन अनुबंधन
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अध्याय 6: अधिगम - समीक्षात्मक प्रश्न [पृष्ठ १३५]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Psychology [Hindi] Class 11
अध्याय 6 अधिगम
समीक्षात्मक प्रश्न | Q 2. | पृष्ठ १३५
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