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प्रश्न
रुधिर के कणीय अवयव क्या है?
उत्तर
रुधिर के कणीय अवयव रुधिर हल्के पीले रंग का, गाढ़ा, हल्का क्षारीय (pH7-3-7-4) द्रव होता है। स्वस्थ मनुष्य में रुधिर उसके कुल भार का 7% से 8% होता है। इसके दो मुख्य घटक होते हैं
- निर्जीव तरल मैट्रिक्स प्लाज्मा तथा
- कणीय अवयव रुधिर कणिकाएँ |
रुधिर कणिकाएँ रुधिर का लगभग 45% भाग बनाती हैं। ये तीन प्रकार की होती हैं
(क) लाल रुधिर कणिकाएँ
(ख) श्वेत रुधिर कणिकाएँ तथा
(ग) रुधिर प्लेटलेट्स।
लाल रुधिर कणिकाएँ
लाल रुधिर कणिकाएँ कशेरुकी जन्तुओं में ही पाई जाती हैं। मानव में लाल रुधिराणु 75-8μ व्यास तथा 1-2μ मोटाई के होते हैं। पुरुषों में इनकी संख्या लगभग 50 से 55 लाख किन्तु स्त्रियों में लगभग 45 से 50 लाख प्रति घन मिमी होती है। ये गोलाकार एवं उभयावतल होती हैं। निर्माण के समय इनमें केन्द्रक सहित सभी प्रकार के कोशिकांग होते हैं किन्तु बाद में केन्द्रक, गॉल्जीकाय, माइटोकॉन्ड्रिया, सेन्ट्रियोल आदि संरचनाएँ लुप्त हो जाती हैं, इसीलिए स्तनियों के लाल रुधिराणुओं को केन्द्रकविहीन कहा जाता है। ऊँट तथा लामा में लाल रुधिराणु केन्द्रकयुक्त होते हैं। लाल रुधिराणुओं में हीमोग्लोबिन प्रोटीन होती है। स्तनियों में इनका जीवनकाल लगभग 120 दिन होता है। वयस्क अवस्था में इनका निर्माण लाल अस्थिमज्जा में होता है। हीमोग्लोबिन, हीम नामक वर्णक तथा ग्लोबिन नामक प्रोटीन से बना होता है। हीम पादपों में उपस्थित क्लोरोफिल के समान होता है, जिसमें क्लोरोफिल के मैग्नीशियम के स्थान पर हीमोग्लोबिन में लौह होता है।
हीमोग्लोबिन का अणु सूत्र = \[\ce{C3032 H4816 O872 N780 S8 Fe4}\] होता है |
हीमोग्लोबिन के एक अणु का निर्माण हीम के 4 अणुओं के एक ग्लोबिन अणु के साथ संयुक्त होने से होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लाल रुधिराणुओं के कार्य ।
लाल रुधिराणुओं के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
- यह एक श्वसन वर्णक है। यह ऑक्सीजन वाहक के रूप में कार्य करता है। हीमोग्लोबिन का एक अणु ऑक्सीजन के चार अणुओं का संवहन करता है।
- शरीर के अन्त:वातावरण में pH सन्तुलन को बनाए रखने में हीमोग्लोबिन सहायता करता है।
- कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कार्बोनिक एनहाइड्रेज नामक एन्जाइम की उपस्थिति में ऊतकों से फेफड़ों की ओर करता है।
स्तनि (खरगोश) की रुधिर कणिकाएँ |
श्वेत रुधिर कणिकाएँ।
श्वेत रुधिर कणिकाएँ अनियमित आकार की, केन्द्रकयुक्त, रंगहीन तथा अमीबीय कोशिकाएँ हैं। इनके कोशिकाद्रव्य की संरचना के आधार पर इन्हें दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है
(अ) ग्रैन्यूलोसाइट्स तथा
(ब) एग्रैन्यूलोसाइट्स।
(अ) ग्रेन्यूलोसाइट्स:
इनका कोशिकाद्रव्य कणिकामय तथा केन्द्रक पालियुक्त होता है, ये तीन प्रकार की होती हैं
(i) बेसोफिल्स
(ii) इओसिनोफिल्स तथा
(iii) न्यूट्रोफिल्स।
(i) बेसोफिल्स:
ये संख्या में कम होती हैं। ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का लगभग 0-5 से 2% होती हैं। इनका केन्द्रक बड़ा तथा 2-3 पालियों में बँटा दिखाई देता है। इनका कोशिकाद्रव्य मेथिलीन ब्लू जैसे-क्षारीय रजंकों से अभिरंजित होता है। इन कणिकाओं से हिपैरिन, हिस्टैमीन एवं सेरेटोनिन स्रावित होता है।
(ii) इओसिनोफिल्स या एसिडोफिल्स:
ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का 2-4% होते हैं। इनका केन्द्रक द्विपालिक होता है। दोनों पालियाँ परस्पर महीन तन्तु द्वारा जुड़ी रहती हैं। इनका कोशिकाद्रव्य अम्लीय रंजकों जैसे इओसीन से अभिरंजित होता है। ये शरीर की प्रतिरक्षण, एलर्जी तथा हाइपरसेन्सिटिवटी का कार्य करते हैं। परजीवी कृमियों की उपस्थिति के कारण इनकी संख्या बढ़ जाती है, इस रोग को इओसिनोफिलिया कहते हैं।
(iii) न्यूटोफिल्स या हेटेरोफिल्स:
ये कुल श्वेत रुधिर कणिकाओं का 60 - 70% होती हैं। इनका केन्द्रक बहुरूपी होता है। यह तीन से पाँच पिण्डों में बँटा होता है। ये सूत्र द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। इनके कोशिकाद्रव्य को अम्लीय, क्षारीय व उदासीन तीनों प्रकार के रंजकों से अभिरंजित कर सकते हैं। ये जीवाणु तथा अन्य हानिकारक पदार्थों का भक्षण करके शरीर की सुरक्षा करते हैं। इस कारण इन्हें मैक्रोफेज कहते हैं।
(ब) एग्रैन्यूलोसाइट्स:
इनका कोशिकाद्रव्य कणिकारहित होता है। इनका केन्द्रक अपेक्षाकृत बड़ा व घोड़े की नाल के आकार का होता है। ये दो प्रकार की होती हैं
(i) लिम्फोसाइट्स:
ये छोटे आकार के श्वेत रुधिराणु हैं। इनका कार्य प्रतिरक्षी का निर्माण करके शरीर की सुरक्षा करना है।
(ii) मोनोसाइट्स:
ये बड़े आकार की कोशिकाएँ हैं, जो भक्षकाणु क्रिया द्वारा शरीर की सुरक्षा करती हैं।
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