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प्रश्न
'सैद्धान्तिक दूरी' क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर
भारतीय संविधान घोषणा करता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी भाग में स्वतन्त्रता और प्रतिष्ठा के साथ रहने का अधिकार है। मगर वास्तव में वर्जना और भेदभाव के अनेक रूप अभी दिखाई देते हैं। इसके अग्रलिखित उदाहरण प्रस्तुत हैं -
- सन् 1984 के दंगों में दिल्ली और देश के शेष भागों में लगभग 4,000 सिखों को मार दिया गया। पीड़ितों के परिजनों का मानना है कि दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली है।
- हजारों कश्मीरी पण्डितों को घाटी में अपना घर छोड़ने के लिए विवश किया गया। वे दो दर्शकों के बाद भी अपने घर नहीं लौट सके हैं।
- सन् 2002 में गुजरात में लगभग 2,000 मुसलमान मारे गए। इन परिवारों के जीवित बचे हुए अनेक सदस्य अभी भी अपने गाँव वापस नहीं जा सके हैं, जहाँ से वे उजाड़ दिए गए थे।
उपर्युक्त प्रस्तुत उदाहरणों में किसी-न-किसी रूप में भेदभाव दिखाई देता है। प्रत्येक मामले में किसी एक धार्मिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया और उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें सताया गया। दूसरों शब्दों में नागरिकों के एक समूह को बुनियादी स्वतन्त्रता से वंचित किया गया। यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्त उदाहरण अन्तरधार्मिक वर्चस्व और एक धार्मिक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के उत्पीड़न के प्रकरण हैं। धर्मनिरपेक्षता को सर्वप्रथम और सर्वप्रमुख रूप से ऐसा सिद्धान्त समझा जाना चाहिए जो अन्तर धार्मिक वर्चस्व का विरोध करता है। हालाँकि यह धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में से केवल एक है।
धर्मनिरपेक्षता का इतना ही महत्त्वपूर्ण दूसरा पहलू अन्त:धार्मिक वर्चस्व अर्थात् धर्म में । छिपे वर्चस्व का विरोध करना है। यही सैद्धान्तिक दूरी है।
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क्या आप नीचे दिए गए कथन से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
धर्मनिरपेक्षता किसी धार्मिक समुदाय के अन्दर या विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच
असमानता के खिलाफ है।
क्या आप नीचे दिए गए कथन से सहमत हैं? उनके समर्थन या विरोध के कारण भी दीजिए।
धर्मनिरपेक्षता के विचार का जन्म पश्चिमी और ईसाई समाज में हुआ है। यह भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता का जोर धर्म और राज्य के अलगाव पर नहीं वरन उससे अधिक किन्ही बातों पर है। इस कथन को समझाइये।