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समानता के लिए लोगों के संघर्ष में हमारे संविधान की क्या भूमिका हो सकती है? - Social Science (सामाजिक विज्ञान)

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प्रश्न

समानता के लिए लोगों के संघर्ष में हमारे संविधान की क्या भूमिका हो सकती है? 

संक्षेप में उत्तर

उत्तर

संविधान भी भारत के सभी नागरिकों को एक समान मानता है। संविधान जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं करता। इसलिए तब लोग समानता के लिए संघर्ष करते हैं, संवैधानिक कानून उनके पक्ष में होती है। जब भी समानता के लिए संघर्ष का मामला न्यायालय में जाता है। न्यायालय संविधान को ध्यान में रखते हुए फैसला सघर्ष करने वालों के पक्ष में देता है। इसलिए समानता के लिए लोगों के संघर्ष में संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

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भारत का संविधान-एक जीता हुआ दस्तावेज़
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अध्याय 9: समानता के लिए संघर्ष - अभ्यास [पृष्ठ १०९]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Social Science - Social and Political Life 2 [Hindi] Class 7
अध्याय 9 समानता के लिए संघर्ष
अभ्यास | Q 10. | पृष्ठ १०९

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जाने का हक

मेरे सपनों को ये जानने का हक रे। .....

क्यूँ सदियों से टूट रहे हैं, इन्हें सजने का नाम नहीं

मेरे हाथों को ये जानने का हक रे......

क्यूँ बरसों से खाली पड़े हैं, इन्हें आज़ भी काम नहीं

मेरे पैरों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गाँव-गाँव चलना पड़े है, क्यूँ बीएस का निशान नहीं

मेरी भूख को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोदामों में सड़ते हैं दाने, मुझे मुट्ठी- भर धान अन्य नहीं

मेरी बूढ़ी माँ को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोली नहीं सुई, दवाखाने, पट्टी-टाँके का सामान नहीं

मेरे बच्चों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ रात-दिन करें मज़दूरी, क्यूँ शाला मेरे गाँव में नहीं

उपर्युक्त गीत में से आपको कौन-सी पँक्ति प्रिय लगी?


जाने का हक

मेरे सपनों को ये जानने का हक रे। .....

क्यूँ सदियों से टूट रहे हैं, इन्हें सजने का नाम नहीं

मेरे हाथों को ये जानने का हक रे......

क्यूँ बरसों से खाली पड़े हैं, इन्हें आज़ भी काम नहीं

मेरे पैरों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गाँव-गाँव चलना पड़े है, क्यूँ बीएस का निशान नहीं

मेरी भूख को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोदामों में सड़ते हैं दाने, मुझे मुट्ठी- भर धान अन्य नहीं

मेरी बूढ़ी माँ को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोली नहीं सुई, दवाखाने, पट्टी-टाँके का सामान नहीं

मेरे बच्चों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ रात-दिन करें मज़दूरी, क्यूँ शाला मेरे गाँव में नहीं

'मेरी भूख को ये जानने का हक रे' इस पँक्ति से कवि का आशय क्या हो सकता है?


क्या आप अपनी भाषा में अपने क्षेत्र में प्रचलित कोई ऐसा गीत या कविता कक्षा में सुना सकते हैं, जिसमें मनुष्य की समता और गरिम का वर्णन मिलता हो?


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