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प्रश्न
परिच्छेद पढ़कर निम्नलिखित कृतियाँ पूर्ण कीजिए:
"संसार में पाप है, जीवन में दोष, व्यवस्था में अन्याय है, व्यवहार में अत्याचार... और इस तरह समाज पीड़ित और पीड़क वर्गों में बँट गया है। सुधारक आते हैं, जीवन की इन विडंबनाओं पर घनघोर चोट करते हैं। विडंबनाएँ टूटती-बिखरती नजर आती हैं पर हम देखते हैं कि सुधारक चले जाते हैं और विडंबनाएँ अपना काम करती रहती हैं।" आखिर इसका रहस्य क्या है कि संसार में इतने महान पुरुष, सुधारक, तीर्थंकर, अवतार, संत और पैगंबर आ चुके पर यह संसार अभी तक वैसा-का-वैसा ही चल रहा है? इसे वे क्यों नहीं बदल पाए? दूसरे शब्दों में जीवन के पापों और विडंबनाओं के पास वह कौन-सी शक्ति है जिससे वे सुधारकों के इन शक्तिशाली आक्रमणों को झेल जाते हैं और टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर नहीं जाते? शॉ ने इसका उत्तर दिया है कि मुझपर हँसकर और इस रूप में मेरी उपेक्षा करके वे मुझे सह लेते हैं। यह मुहावरे की भाषा में सिर झुकाकर लहर को ऊपर से उतार देना है। शॉ की बात सच है पर यह सच्चाई एकांगी है। सत्य इतना ही नहीं है। |
- संजाल पूर्ण कीजिए: (२)
- निम्नलिखित शब्दों के उपसर्ग हटाकर मूल शब्द गद्यांश में से दूँढ़कर लिखिए: (२)
- आजीवन −
- सदोष −
- असत्य −
- सशस्त्र −
- किसी एक समाज सुधारक के बारे में अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए। (२)
उत्तर
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- आजीवन − जीवन
- सदोष − दोष
- असत्य − सत्य
- सशस्त्र − शस्त्र
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महात्मा गांधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायक होने के साथ-साथ एक प्रभावशाली समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अहिंसा और सत्य के आदर्शों को अपनाते हुए सामाजिक परिवर्तन किए। उन्होंने अस्पृश्यता, जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आंदोलन चलाए और हरिजन आंदोलन के माध्यम से दलितों को समान अधिकार दिलाने का प्रयास किया।
महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने में उनका योगदान सराहनीय था। उनका स्वदेशी आंदोलन आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए था, जिससे कुटीर उद्योगों को बल मिला। दांडी यात्रा के जरिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध किया। उनका जीवन त्याग और सेवा का प्रतीक था।