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प्रश्न
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लैमार्कवाद
संक्षेप में उत्तर
उत्तर
- लैमार्कवाद में दो सिद्धांतों का समावेश किया गया है। इन दोनों सिद्धांत का प्रतिपादन जीन बैप्टीस्ट लैमार्क द्वारा किया गया। यह दोनों सिद्धांत इस प्रकार से हैं :
(a) अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग
(b) उपार्जित लक्षणों की वंशागति [उपार्जित परिवर्तन के संक्रमण का सिद्धांत] - लैमार्क के मतानुसार उत्क्रांति होते समय सजीवों की शारीरिक रचना में होने वाले परिवर्तन उस सजीव की सक्रियता या निष्क्रियता के कारण होता है।
- सजीव जिस अंग का अधिक क्षमता के साथ उपयोग करता है। उस अंग का अधिक विकास और वृद्धि होती है। इसी को लैमार्क ने ‘अंगों का उपयोग तथा अनुपयोग' के सिद्धांत में समझाने का प्रयास किया है।
- अपने इस सिद्धांत पर जोर देते हुए उन्होंने निम्नलिखित उदाहरण दिए।
(i) पीढ़ी दर पीढ़ी जिराफ अपनी गर्दन तानकर ऊँचे पेड़ों की पत्तियाँ खाने के कारण जिराफ लंबी गर्दनवाला प्राणी बना।
(ii) इसी प्रकाश लोहार की दोनों भुजाएँ लगातार कार्य करने के कारण अत्यधिक मजबूत हुई।
(iii) शुतुरमुर्ग, इमू, इत्यादि पक्षियों द्वारा पंखों का उपयोग न करने के कारण उनके पंख कमजोर, उपयोग हीन हो गए।
(iv) हंस तथा बत्तख जैसे जलीय पक्षियों ने पानी में रहकर अपने पैरों को तैरने योग्य बनाया।
(v) इसी प्रकार साँपों के लगातार बिल में रहने के कारण साँपों ने अपने पैर गवाँ दिए। - यह सभी उदाहरण 'उपार्जित लक्षणों की वंशागति अथवा उपार्जित परिवर्तन के 'संक्रमण का सिद्धांत' के उदाहरण हैं ऐसे उपार्जित लक्षण एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में संक्रमित होते हैं। इसे ही लैमार्कवाद कहा गया है।
- लैमार्कवाद का यह सिद्धांत स्वीकार नहीं किया गया। क्योंकि एक पीढ़ी के उपार्जित लक्षण दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित नहीं किए जाते है। यह कई अनुसंधानों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है। इस कारण लैमार्कवाद का यह प्रतिपादन त्रुटिपूर्ण कहा जा सकता है।
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लैमार्कवाद (Lamarkism)
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