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प्रश्न
टिप्पणी लिखिए।
रेशम कीटकपालन
उत्तर
रेशम के उत्पादन के लिए रेशम के कीड़े पाले जाते हैं। बॉम्बिक्स मोरी प्रजाति के रेशमी कीड़ों को उपयोग इसके लिए सर्वाधिक होता है। रेशमी कीड़ों के जीवनचक्र में अंड-इल्ली-कोशित या प्यूपा शलभ ये चार अवस्थाएँ होती हैं। मादा द्वारा दिए गए हजारों अंडों को कृत्रिमरूप से गर्माहट देकर उष्मायन अवधि को कम किया जाता है। अंडे से बाहर निकलने वाली इल्ली को शहतूत के पेड़ पर छोड़ दिया जाता है। शहतूत के पत्ते खाकर इल्ली का पोषण होता है। 3-4 हफ्तों तक पत्तियाँ खाने के उपरांत इल्ली शहतूत के शाखाओं पर जाती है। इनकी लारग्रंथि से निकलने वाले स्राव से रेशमी तंतु बनता है। यह तंतु को स्वयं के चारों ओर लपेटकर इल्ली का रेशमीकोष तैयार करता है, यह कोष बेलनाकार या वृत्ताकार होता है।
कोशित या प्यूपा का पतंगा या शलभ के रूप में रूपांतरण होने के दस दिन पूर्व सारे कोशित उबलते हुए पानी में डाल दिए जाते हैं। उबलते पानी के कारण कोशित की इल्ली मर जाती है व रेशम के तंतु ढीले हो जाते हैं। इन्हें सुलझा कर इस पर प्रक्रिया की जाती है व रेशम का धागा प्राप्त किया जाता है। रेशमी धागों से अलग-अलग प्रकार के वस्त्र बनते हैं।