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प्रश्न
1940 के प्रस्ताव के जरिए मुस्लिम लीग ने क्या माँग की?
उत्तर
मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसम्बर, 1906 ई० को ढाका में की गई। यह भारतीय मुसलमानों की प्रथम राजनैतिक संस्था थी। भारतीय मुसलमानों की ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति की भावनाओं में वृद्धि करना तथा उनके प्रति सरकार के संदेहों को दूर करना, इसका एक प्रमुख उद्देश्य था। शीघ्र ही लीग उत्तर प्रदेश के, विशेष रूप से अलीगढ़ के, संभ्रांत मुस्लिम वर्ग के प्रभाव में आ गई। ब्रिटिश प्रशासकों ने लीग का प्रयोग राष्ट्रीय आंदोलन को दुर्बल बनाने तथा शिक्षित मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित होने से रोकने के साधन के रूप में किया।
1937 ई० में कांग्रेस द्वारा संयुक्त प्रान्त में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमण्डल बनाने से इनकार कर दिए जाने पर कांग्रेस और लीग के संबंध बहुत अधिक बिगड़ गए थे। लीग ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा लगाया और कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था बताया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सभी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों द्वारा नवम्बर 1939 ई० में त्यागपत्र दे दिए जाने पर मुस्लिम लीग अत्यधिक प्रसन्न हुई। लीग ने ‘द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत’ का प्रचार किया तथा मुस्लिम जनसामान्य एवं ब्रिटिश प्रशासकों को यह विश्वास दिलाने का भरसक प्रयास किया कि मुसलमानों के हित हिन्दू हितों से भिन्न है और अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं से भारी खतरा है।
मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सीमित स्वायत्तता की माँग की गई। प्रस्ताव में कहा गया कि “ भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में आवश्यकतानुसार क्षेत्रों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन भागों में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें इकट्ठा करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए, जिनमें सम्मिलित इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी।”