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'अंतिम बार गोद में बेटी; तुमको ले न सका मैं हा एक फूल माँ के प्रसाद का तुझको दे न सका मैं हा!' i. प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से ली गई हैं? यहाँ मैं शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? - Hindi (Indian Languages)

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प्रश्न

'अंतिम बार गोद में बेटी;

तुमको ले न सका मैं हा

एक फूल माँ के प्रसाद का

तुझको दे न सका मैं हा!'

  1. प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से ली गई हैं? यहाँ मैं शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?            [1]
  2. 'बेटी ने किससे, क्या इच्छा जाहिर की?                       [2]
  3. क्या वक्ता की इच्छा पुरी हो सकी? कारण सहित उत्तर लिखिए।            [2]
  4. इस कविता में कवि ने किस भेदभाव को उजागर किया हैं? वह किस प्रकार देश की प्रगति में बाधक है? समझाकर लिखिए।               [5]
थोडक्यात उत्तर

उत्तर

  1. प्रस्तुत पंक्तियाँ 'सियारामशरण गुप्त' द्वारा रचित कविता 'एक "फूल की चाह' से अवतरित हैं । प्रस्तुत पंक्तियों में 'मैं' शब्द का कविता की मुख्य पात्र, सुखिया का पिता अपने लिए प्रयोग करता है।
  2. प्रस्तुत कविता में बेटी ने अपने पिता से देवी माँ के चरणों का प्रसाद का फूल लाने की इच्छा प्रकट की ताकि उस प्रसाद को पाकर वह जल्दी ठीक हो जाए।
  3. प्रस्तुत कविता में वह अभागा पिता अपनी बेटी की उस आखिरी इच्छा को पूरा नहीं कर सका क्योंकि जब वह मंदिर में देवी माँ के दर्शन व पूजा करके प्रसाद का फूल लेकर वापस लौट रहा था तभी मंदिर के पुजारी व धर्म के ठेकेदार लोगों ने उसे देख लिया। वह अछूत जाति का था इसलिए उसे मंदिर में प्रवेश का अधिकार नहीं था। पिता वापस अपनी बेटी के पास लौटा तो उसकी बेटी मर चुकी थी वहाँ केवल राख की ढेरी ही शेष थी। अतः वह अपनी बेटी की आखिरी इच्छा भी पूरी नहीं कर सका था।
  4. प्रस्तुत कविता में गुप्तजी ने छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर किया है। इस कविता में छुआछूत जैसी भारतीय समाज की संकीर्ण विचारधारा पर प्रकाश डाला है। महामारी की चपेट में आ जाने से उसकी प्रिय बेटी का शरीर ज्वर से तपने लगता है और वह बहुत कमजोर भी हो जाती है। पिता उसे बचाने का भरसक प्रयास करता है। इसी क्रम में सुखिया अपने पिता से देवी माँ का प्रसाद रूपी फूल लाने का आग्रह करती है। दलित होने के कारण उनका मंदिर में प्रवेश वर्जित था, फिर भी वह पिता यह अपराध करता है और इस अपराध के लिए पिटाई, व अपमान सहना पड़ता है। प्रस्तुत कविता में एक बीमार बच्ची के दलित पिता की पीड़ा को दर्शाया गया है। अछूत कहकर तथा मंदिर को अपवित्र करने के अपराधी दलित पिता को अपनी पुत्री की अंतिम इच्छा पूरी करने का सौभाग्य भी नहीं मिला। जाति के आधार पर भेदभाव एक सामाजिक अपराध है छुआछूत के नाम पर दलितों को मंदिर में प्रवेश न करने देना मानवता के विरुद्ध है। ईश्वर ने किसी मनुष्य में कोई भेद नहीं किया है तो हम मनुष्य धर्म के ठेकेदार बनकर यह निर्णय कैसे कर सकते हैं कि कौन अछूत है और कौन पवित्र। यह देश के लिए हानिकारक है इस वर्ग भेद के रहते देश कभी प्रगति नहीं कर सकता। ईश्वर ने किसी मनुष्य में कोई भेद नहीं किया है देश के हित के लिए हमें भेदभाव नहीं करना चाहिए और सबको सम्मान देना चाहिए।
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पद्य (१२ वी कक्षा )
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