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अवधान के गुणों की व्याख्या कीजिए। - Psychology (मनोविज्ञान)

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प्रश्न

अवधान के  की व्याख्या कीजिए।

दीर्घउत्तर

उत्तर

अवधान के अर्थ एवं परिभाषाओं के उपर्युक्त विवरण के आधार पर इसकी निम्नलिखित मुख्य गुणों का वर्णन किया जा सकता है:

  • चुनाव -
    अवधान अथवा ध्यान की प्रक्रिया में चुनाव का विशेष महत्त्व होता है। हमारे वातावरण में सदैव अनेक ऐसे तत्त्व विद्यमान रहते हैं, जो निरन्तर हमें आकर्षित करते रहते हैं, परन्तु हमारा ध्यान एक समय में केवल एक ही पर पर केंद्रित होता है। इस चुनाव को हमारी रुचि, मनोवृत्ति तथा आवश्यकताएँ प्रभावित करती हैं।
  • चंचलता -
    अवधान की एक प्रमुख विशेषता है कि यह बहुत ही चंचल होता है। किसी एक विषय - वस्तु पर अधिक समय तक ध्यान को केंद्रित नहीं किया जा सकता है। सामान्य रूप से ध्यान केवल कुछ सेकंड तक ही पूर्ण रूप से केंन्द्रित रह पाता है। वुडवर्थ के अनुसार, "अवधान चलायमान है, क्योंकि यह अन्वेषक है, यह परीक्षण हेतु कुछ नवीनता की निरन्तर खोज करता है।"
  • मानसिक तत्परता -
    ध्यान केंन्द्रित करने के लिए एक प्रकार की मानसिक तत्परता आवश्यक होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी विषय पर ध्यान केंन्द्रित करने के लिए तैयार नहीं है तो सरलता से ध्यान नहीं लग सकता।
  • प्रयोजन -
    सामान्य रूप से अवधान या ध्यान सप्रयोजन होता है। प्रयोजन के अभाव में ध्यान का केंद्रित हो पाना कठिन होता है।
  • संकीर्णता -
    अवधान या ध्यान का क्षेत्र व्यापक नहीं होता, वरन्‌ अत्यंत सीमित अथवा संकीर्ण होता है। कोई भी व्यक्ति एक ही समय में अनेक विषयों पर ध्यान केंन्द्रित नहीं कर सकता।
  • विपक्षीय प्रक्रिया - 
    अवधान अथवा ध्यान एक त्रिपक्षीय प्रक्रिया है। अवधान की प्रक्रिया में ज्ञानात्मक, भावनात्मक तथा क्रियात्मक तीन पक्ष निहित होते हैं। सर्वप्रथम अवधान द्वारा ज्ञान अर्जित किया जाता है, इसके साथ-ही-साथ अवधान के परिणामस्वरूप मन में भावनाएं उत्पन्न होती हैं तथा हम कुछ क्रियाएँ भी कर सकते हैं।
  • संश्लेषणात्मकता तथा विश्लेषणात्मकता -
    अवधान की प्रक्रिया के अंतर्गत हम सम्बंधित विषय-वस्तु के विभिन्न पक्षों का संश्लेषण तथा विश्लेषण दोनों ही करते हैं।
  • अन्वेषणात्मकता :
    अवधान सदैव अन्वेषणात्मक होता है। प्रत्येक नवीन विषय-वस्तु की ओर हमारा ध्यान स्वाभाविक रूप से ही आकृष्ट हो जाता है।
  • क्रियाओं का समायोजन :
    अवधान के समय समस्त क्रियाएँ वातावरण से समायोजित हो जाती हैं। मन के शब्दों में, "अवधान के कार्य में ग्राहक समायोजन, मुद्रा समायोजन, मांसपेशियों का तनाव तथा केंन्द्रीय स्तायविक समायोजन की विशेषताएँ होती हैं। उदाहरणार्थ- व्याख्यान सुनते समय समस्त इन्द्रियाँ, मांसपेशियाँ तथा स्नायुमंडल व्याख्यानकर्ता से जुड़ जाता है।"
  • सजीवता :
    अवधान की स्थिति में चेतना जागरूक होती है और अवधान की वस्तुएँ सजीव ह जाती हैं, जबकि चेतना में अन्य वस्तुओं का अस्तित्व निर्जीव हो जाता है।
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अवधानिक प्रक्रियाएँ
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पाठ 5: संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ - समीक्षात्मक प्रश्न [पृष्ठ १०९]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Psychology [Hindi] Class 11
पाठ 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ
समीक्षात्मक प्रश्न | Q 5. (b) | पृष्ठ १०९
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