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फ़्रांस में क्रांति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई? - Social Science (सामाजिक विज्ञान)

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प्रश्न

फ़्रांस में क्रांति की शुरुआत किन परिस्थितियों में हुई?

दीर्घउत्तर

उत्तर

निम्नलिखित परिस्थितियों के कारण फ़्रांस में क्रांतिकारी विरोध की शुरुआत हुई:

  • सामाजिक परिस्थितियाँ: वहाँ पर सामंतवाद की प्रथा थी जो तीन वर्गों में विभक्त थी: प्रथम वर्ग, द्वितीय वर्ग एवं तृतीय वर्ग। प्रथम एस्टेट में पादरी आते थे। दूसरे एस्टेट में कुलीन एवं तृतीय एस्टेट में व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान, कारीगर, भूमिहीन मजदूर एवं नौकर आते थे। यह केवल तृतीय एस्टेट ही थी जो सभी कर देने को बाध्य थी। पादरी एवं कुलीन वर्ग के लोगों को सरकार को कर देने से छूट प्राप्त थी। सरकार को कर देने के साथ-साथ किसानों को चर्च को भी कर देना पड़ता था। यह एक अन्यायपूर्ण स्थिति थी जिसने तृतीय एस्टेट के सदस्यों में असंतोष की भावना को बढ़ावा दिया।
  • आर्थिक परिस्थितियाँ: सन् 1774 में बूबू राजवंश का लुई सोलहवाँ फ़्रांस के सिंहासन पर बैठा और उसने ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मेरी एन्तोएनेत से शादी की। सत्तारूढ़ होने पर उसे शाही खजाना खाली मिला। सेना का रखरखाव, दरबार का खर्च, सरकारी कार्यालयों या विश्वविद्यालयों को चलाने जैसे अपने नियमित खर्च निपटाने के लिए सरकार कर बढ़ाने पर बाध्य हो गई। कर बढ़ाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए फ्रांस के सम्राट लुई सोलहवें ने 5 मई 1789 को एस्टेट के जनरल की सभा बुलाई। प्रत्येक एस्टेट को सभा में एक वोट डालने की अनुमति दी गई। तृतीय एस्टेट ने इस अन्यायपूर्ण प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने सुझाव रखा कि प्रत्येक सदस्य का एक वोट होना चाहिए। सम्राट ने इस अपील को ठुकरा दिया तथा तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सदस्य विरोधस्वरूप सभा से वाक आउट कर गए।
  • फ्रांसीसी जनसंख्या: में भारी बढ़ोतरी के कारण इस समय खाद्यान्न की माँग बहुत बढ़ गई थी। परिणामस्वरुप, पावरोटी (अधिकतर के भोजन का मुख्य भाग) के भाव बढ़ गए। बढ़ती कीमतों व अपर्याप्त मजदूरी के कारण अधिकतर जनसंख्या जीविका के आधारभूत साधन भी वहन नहीं कर सकती थी। इससे जीविका संकट उत्पन्न हो गया तथा अमीर और गरीब के मध्य दूरी बढ़ गई।
  • दार्शनिकों का योगदानः अठारहवीं सदी के दौरान मध्यम वर्ग शिक्षित एवं धनी बन कर उभरा। सामंतवादी समाज द्वारा प्रचारित विशेषाधिकार प्रणाली उनके हितों के विरुद्ध थी। शिक्षित होने के कारण इस वर्ग के सदस्यों की पहुँच फ्रांसीसी एवं अंग्रेज राजनैतिक एवं सामाजिक दार्शनिकों द्वारा सुझाए गए समानता एवं आजादी के विभिन्न विचारों तक थी। ये विचार सैलून एवं कॉफी-घरों में जनसाधारण के बीच चर्चा तथा वाद-विवाद के फलस्वरूप तथा पुस्तकों एवं अखबारों के द्वारा लोकप्रिय हो गए। दार्शनिकों के विचारों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जॉन लॉक, जीन जैक्स रूसो एवं मांटेस्क्यू ने राजा के दैवीय सिद्धांत को नकार दिया।
  • राजनैतिक कारण: तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधियों ने मिराब्यो एवं आबे सिए के नेतृत्व में स्वयं को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया एवं शपथ ली कि जब तक वे सम्राट की शक्तियों को सीमित करने व अन्यायपूर्ण विशेषाधिकारों वाली सामंतवादी प्रथा को समाप्त करने वाला संविधान नहीं बनाएँगे तब तक सभा को भंग नहीं करेंगे। जिस समय राष्ट्रीय सभा संविधान का मसौदा बनाने में व्यस्त थी, उस दौरान सामंतों को विस्थापित करने के लिए बहुत से स्थानीय विद्रोह हुए। इसी बीच, खाद्य संकट गहरा गया तथा जनसाधारण का गुस्सा गलियों में फूट पड़ा। 14 जुलाई को सम्राट ने सैन्य टुकड़ियों को पेरिस में प्रवेश करने के आदेश दिये। इसके प्रत्युत्तर में सैकड़ों क्रुद्ध पुरुषों एवं महिलाओं ने स्वयं की सशस्त्र टुकड़ियाँ बना लीं। ऐसे ही लोगों की एक सेना बास्तील किले की जेल (सम्राट की निरंकुश शक्ति का प्रतीक) में जा घुसी और उसको नष्ट कर दिया। इस प्रकार फ़्रांसीसी क्रांति का प्रारंभ हुआ।
  • सम्राट लुई: सोलहवें एवं उसकी रानी मेरी एन्तोएनेत ने अपने विलासितापूर्ण जीवन एवं खर्चीले तौर-तरीकों पर काफी धन बर्बाद किया। उच्च पद आमतौर पर बेचे जाते थे। पूरा प्रशासन भ्रष्ट था और प्रत्येक विभाग के अपने ही कानून थे। किसी एक समान प्रणाली के अभाव में चारों ओर भ्रम का वातावरण था। लोग प्रशासन की इस दूषित प्रणाली से तंग आ चुके थे तथा इसे बदलना चाहते थे।
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परिचय: फ़्रांसीसी क्रांति
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पाठ 1: फ्रांसीसी क्रांति - प्रश्न [पृष्ठ २४]

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एनसीईआरटी Social Science - India and the Contemporary World 1 [Hindi] Class 9
पाठ 1 फ्रांसीसी क्रांति
प्रश्न | Q 1. | पृष्ठ २४
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