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गुलाम के रूप में पकड़कर ब्राजील ले जाए गए एक सत्रहवर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें? - History (इतिहास)

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प्रश्न

गुलाम के रूप में पकड़कर ब्राजील ले जाए गए एक सत्रहवर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें?

थोडक्यात उत्तर

उत्तर

पुर्तगालियों का ब्राजील पर कब्जा महज एक इत्तफ़ाक था। पेड्रो अल्वारिस कैब्राल एक दिलेर नाविक था। उसने 1500 ई० में एक विशाल जहाजी बेड़े के साथ भारत की ओर प्रस्थान किया। लेकिन पश्चिमी अफ्रीका का एक बड़ा चक्कर लगाकर वह ब्राजील के समुद्रतट पर जा पहुँचा। यद्यपि पुर्तगालियों को ब्राजील से सोना मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी तथापि वे वहाँ की इमारती लकड़ी के द्वारा पर्याप्त धन कमा संकते थे।
नि:संदेह ब्राजील की इमारती लकड़ी की यूरोप में अत्यधिक माँग थी। इसके व्यापार को लेकर पुर्तगाली और फ्रांसीसी व्यापारी बार-बार संघर्ष में उलझते रहते थे। लेकिन अंत में विजय पुर्तगालियों को मिली। इसी क्रम में पुर्तगाल के राजा ने 1534 ई० में ब्राजील के तट को 14 आनुवंशिक कप्तानियों में विभक्त कर दिया और उनके स्वामित्व के अधिकार को वहाँ स्थायी रूप से रहने के इच्छुक पुर्तगालियों को सौंप दिया। इसके साथ ही, उन्हें स्थानीय लोगों को गुलाम बनाने का अधिकार भी प्रदान कर दिया। ऐसा अनुमान है कि 1550-1580 शक्तियों ने ब्राजील में करीब 36 लाख से भी अधिक अफ्रीकी गुलामों का आयात किया।

ऐसे ही गुलामों में एक सत्रहवर्षीय लड़का भी सम्मिलित था। उसके हाथ बाँधकर उसे अन्य गुलामों के साथ पशुओं के समान जहाज पर लाद दिया गया। उन सबको कड़ी निगरानी के बीच पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन लाया गया। लिस्बन के एक बड़े बाजार में सभी गुलामों को बेचने के लिए खड़ा कर दिया गया। उस सत्रहवर्षीय गुलाम लड़के की भी बोली लगाई गई। यह सत्य है कि सभी लोग उस जवान लड़के को खरीदना चाहते थे। इसका कारण यह था कि वह स्वस्थ, और हट्टा-कट्टा था तथा अन्य की अपेक्षा अधिक काम कर सकता था। अंत में सबसे ऊँची बोली लगाकर एक व्यक्ति ने उसे लादकर ब्राजील भेज दिया।

ब्राजील में, उस गुलाम लड़के को कठोर से कठोर काम में लगाया जाता था। कभी वृक्षों को काटने को, कभी उसे जहाज में लकड़ी लादने के काम में लगा दिया जाता था तो कभी उससे खेती का काम करवाया जाता था। नि:संदेह उससे पशुओं के समान काम लिया जाता था और वह पशुओं जैसा जीवन व्यतीत करने के लिए विवश था। उसे न तो आत्मसम्मानपूर्वक जीने का अधिकार था और न ही आराम से जीवन व्यतीत करने का। यहाँ तक कि वह अपने नारकीय जीवन से छुतकारा भी पाना चाहता था, लेकिन वह भागने में असमर्थ था। वह जानता था कि उसके एक साथी को भागने का प्रयास करने पर अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा था। हालाँकि वह बुद्धिमान था। केवल भाग्य उसके साथ नहीं था। अंत में उसने अपनी परिस्थितियों से समझौता कर लिया और आजीवन अपने स्वामी का एक निष्ठावान सेवक बने रहने का फैसला लिया।

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पाठ 8: संस्कृतियों का टकराव - अभ्यास [पृष्ठ १८७]

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एनसीईआरटी History [Hindi] Class 11
पाठ 8 संस्कृतियों का टकराव
अभ्यास | Q 5. | पृष्ठ १८७
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