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प्रश्न
'कनुप्रिया' में अवचेतन मन में बैठी राधा चेतनावस्था में स्थित राधा को संबोधित करती है।” इस बात को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
डॉ. धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया' यह कृति हिंदी साहित्य जगत में अत्यन्त चर्चित रही है। 'कनुप्रिया' अर्थात् कन्हैया की प्रिय सखी 'राधा '- कृष्ण अब महाभारत के महायुद्ध के महानायक हैं। राधा को लगता है कि प्रेम त्यागकर युद्ध का अवलंब करना निरर्थक बात है। राधा को लगता है कि उसकी बलि चढ़ाकर कान्हा आगे बढ़े हैं। उसे पुल या सेतु बनाकर ही वे युद्ध के महानायक बने हैं। राधा की मनस्थिति विधात्सक बन चुकी हैं। अवचेतन मन में बैठे राधा और कृष्ण तथा चेतनावस्था में स्थित राधा और कृष्ण। यहाँ अवचेतन मन में बैठी राधा चेतनावस्था में स्थित राधा को संबोधित करते हुए कहती है, हे राधा ! यमुना के घाट से ऊपर आते समय कदंब के पेड़ के नीचे खड़े कनु को देवता समझकर प्रणाम करने के लिए तुम जिस मार्ग से लौटती थी, हे बावरी! आज तुम उस मार्ग से होकर मत लौटना। हे बावरी ! तू आज उस मार्ग से दूर हटकर खड़ी हो जा। लताकुंज की ओट में अपने घायल प्यार को छुपा ले। क्योंकि आज इस गाँव से द्वारिका की उन्मत्त सेनाएँ युद्ध के लिए जा रही हैं। जिस आम की डाली पर बैठकर कान्हा राधा का इंतजार करते थे, वह डाली आज कृष्ण के सेनापतियों के तेज गति वाले रथों की ऊँची पताकाओं में उलझ जाएगी। कान्हा आज राधा के साथ गुजारे तन्मयता के क्षणों को भूलचुके हैं। इस भीड़-भाड़ में उनके प्यार को पहचानने वाला कोई नहीं है। अतः अवचेतन मन में बैठी राधा चेतनावस्था में स्थित राधा को कहती है कि राधे ! तुम्हें तो गर्व होना चाहिए, क्योंकि किसके महान प्रेमी के पास अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ हैं अर्थात् राधा के प्रेमी पास ही इतनी बड़ी सेना हैं।