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क्या आप अपनी भाषा में अपने क्षेत्र में प्रचलित कोई ऐसा गीत या कविता कक्षा में सुना सकते हैं, जिसमें मनुष्य की समता और गरिम का वर्णन मिलता हो? - Social Science (सामाजिक विज्ञान)

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प्रश्न

क्या आप अपनी भाषा में अपने क्षेत्र में प्रचलित कोई ऐसा गीत या कविता कक्षा में सुना सकते हैं, जिसमें मनुष्य की समता और गरिम का वर्णन मिलता हो?

थोडक्यात उत्तर

उत्तर

  • आजादी के बाद से भारत कई संघर्षों का गवाह रहा है।
  • हमने देखा है कि कैसे कुछ समुदायों ने आजादी से पहले उत्पीड़न का सामना किया और फिर अपने अधिकारों के लिए विरोध किया।
  • इन समुदायों के पास विभिन्न गीत हैं जहाँ वे अपने अन्याय और उस गरिमा के बारे में बोलते हैं जिसके वे हकदार हैं। गीत ज़्यादातर स्थानीय भाषा हैं और इसलिए उन्हें क्षेत्रीय भाषा में गाया जाता है।

ऐसे कई स्थानीय गीत या कविताएँ हैं जो विभिन्न क्षेत्रों में गरिमा के बारे में बात करते हैं। वे ज्यादातर स्थानीय भाषाओं में हैं।

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पाठ 9: समानता के लिए संघर्ष - अभ्यास [पृष्ठ १०८]

APPEARS IN

एनसीईआरटी Social Science - Social and Political Life 2 [Hindi] Class 7
पाठ 9 समानता के लिए संघर्ष
अभ्यास | Q 9. | पृष्ठ १०८

संबंधित प्रश्‍न

जाने का हक

मेरे सपनों को ये जानने का हक रे। .....

क्यूँ सदियों से टूट रहे हैं, इन्हें सजने का नाम नहीं

मेरे हाथों को ये जानने का हक रे......

क्यूँ बरसों से खाली पड़े हैं, इन्हें आज़ भी काम नहीं

मेरे पैरों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गाँव-गाँव चलना पड़े है, क्यूँ बीएस का निशान नहीं

मेरी भूख को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोदामों में सड़ते हैं दाने, मुझे मुट्ठी- भर धान अन्य नहीं

मेरी बूढ़ी माँ को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोली नहीं सुई, दवाखाने, पट्टी-टाँके का सामान नहीं

मेरे बच्चों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ रात-दिन करें मज़दूरी, क्यूँ शाला मेरे गाँव में नहीं

उपर्युक्त गीत में से आपको कौन-सी पँक्ति प्रिय लगी?


जाने का हक

मेरे सपनों को ये जानने का हक रे। .....

क्यूँ सदियों से टूट रहे हैं, इन्हें सजने का नाम नहीं

मेरे हाथों को ये जानने का हक रे......

क्यूँ बरसों से खाली पड़े हैं, इन्हें आज़ भी काम नहीं

मेरे पैरों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गाँव-गाँव चलना पड़े है, क्यूँ बीएस का निशान नहीं

मेरी भूख को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोदामों में सड़ते हैं दाने, मुझे मुट्ठी- भर धान अन्य नहीं

मेरी बूढ़ी माँ को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ गोली नहीं सुई, दवाखाने, पट्टी-टाँके का सामान नहीं

मेरे बच्चों को ये जानने का हक रे.......

क्यूँ रात-दिन करें मज़दूरी, क्यूँ शाला मेरे गाँव में नहीं

'मेरी भूख को ये जानने का हक रे' इस पँक्ति से कवि का आशय क्या हो सकता है?


समानता के लिए लोगों के संघर्ष में हमारे संविधान की क्या भूमिका हो सकती है? 


क्या आप एक छोटे समूह में समानता के लिए एक समाजिक विज्ञापन तैयार क्र सकते हो?


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