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निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए। कुछ दिनों के बाद मैंने सुना कि शेर अहिंसा और सह-अस्तित्ववाद का बड़ा जबरदस्त समर्थक है इसलिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं करता। - Hindi (Elective)

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प्रश्न

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

कुछ दिनों के बाद मैंने सुना कि शेर अहिंसा और सह-अस्तित्ववाद का बड़ा जबरदस्त समर्थक है इसलिए जंगली जानवरों का शिकार नहीं करता। मैं सोचने लगा, शायद शेर के पेट में वे सारी चीजें हैं जिनके लिए लोग वहाँ जाते हैं और मैं भी एक दिन शेर के पास गया। शेर आँखें बंद किए पड़ा था और उसका स्टाफ आफ़िस का काम निपटा रहा था। मैंने वहाँ पूछा, "क्या यह सच है कि शेर साहब के पेट के अंदर, रोज़गार का दफ़्तर है?"
मैंने पूछा, "कैसे?"
बताया गया, "सब ऐसा ही मानते हैं।"
मैंने पूछा, "क्यों? क्या प्रमाण है?"
बताया गया, "प्रमाण से अधिक महत्त्वपूर्ण है विश्वास?"
मैंने कहा, "और यह बाहर जो रोजगार का दफ्तर है?"

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उत्तर

संदर्भ:

यह गद्यांश प्रसिद्ध लेखक हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘शेर और रोजगार का दफ्तर’ से लिया गया है। इस रचना में लेखक ने समाज की विसंगतियों, दिखावे और अव्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया है।

प्रसंग:

इस प्रसंग में लेखक ने शेर के माध्यम से समाज में रोजगार और नौकरशाही की स्थिति पर व्यंग्य किया है। अहिंसा और सह-अस्तित्व का समर्थक बन चुका शेर अब शिकार नहीं करता, बल्कि उसका पेट ही 'रोजगार का दफ्तर' बन गया है। इस प्रतीक के माध्यम से लेखक रोजगार से जुड़ी उलझन और अव्यवस्था की ओर इशारा करते हैं।

व्याख्या:

इस गद्यांश में शेर उस व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें वास्तविक समाधान के बजाय दिखावा और भ्रम का माहौल बनाया गया है। लेखक व्यंग्यात्मक रूप से कहता है कि शेर के पेट में रोजगार का दफ्तर है; यानी रोजगार देने की व्यवस्था केवल एक भ्रम है। बाहरी रोजगार कार्यालयों में कोई ठोस प्रमाण या व्यवस्था नहीं है; लोगों को केवल ‘विश्वास’ के नाम पर गुमराह किया जाता है। यह व्यवस्था नौकरशाही और प्रशासनिक विफलताओं पर व्यंग्य है, जहाँ योजनाएँ और दफ्तर तो मौजूद हैं, लेकिन लोगों को रोजगार मिलना कठिन है।

विशेष:

इस गद्यांश की विशेषता इसकी व्यंग्यात्मक शैली है, जो समाज की अव्यवस्था और रोजगार की कठिनाइयों पर गहरा प्रहार करती है। प्रतीकों के माध्यम से लेखक ने गंभीर मुद्दों पर अपनी बात सरलता और बुद्धिमता के साथ प्रस्तुत की है।

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