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प्रश्न
निम्नलिखित का उत्तर लगभग १०० से १२० शब्दों में लिखिए:
“सेवा तीर्थयात्रा से बढ़कर है," इस उक्ति का पल्लवन कीजिए।
उत्तर
"मनुष्य ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है।" मनुष्य के रूप में जीवन प्राप्त करके यदि मानव उसका समुचित उपयोग नहीं करता तो यह जीवन व्यर्थ है। अपना हित-चिंतन तो पशु भी करता है, यदि मनुष्य भी अपने जीवन को स्वयं सेवा या सिर्फ अपनों की सेवा तक केंद्रित कर दे तो वह पशु के समान है। मनुष्य में सेवा भाव नहीं तो समाज में स्वार्थ और तनाव बना रहेगा। सही अर्थों में तो उसी मनुष्य का जीवन इस धरा पर सार्थक है जो दूसरों की सेवा में अपना जीवन सौंप देता है और यह एक तीर्थ के समान है। जैसे भक्त ईश्वर भक्ति में दिन-रात लगे रहते हैं, उसी प्रकार सेवाभावी मनुष्य भी दूसरों की सेवा कर तीर्थ जितना पुण्य प्राप्त करता है। सेवा ही एक मात्र ऐसा एक भाव है जो चिरकाल तक मानवता को सुरक्षित रखता है। ऐसे अनेक महापुरुषों की जीवनियों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं, जिन्होंने दूसरों की सेवा में अनेक यातनाएँ सहीं।
सेवा एक ऐसा आभूषण है जिससे व्यक्ति का चरित्र व उसका संपूर्ण जीवन सुंदर हो जाता है। सेवा भाव के लिए कृतज्ञता आवश्यक है। सेवा ही संपूर्ण तीर्थ यात्राओं का फल है। जो सेवा करे सो मेवा पावे।
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