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प्रश्न
सातवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर
सातवीं शताब्दी में अरब का समाज अनेक कबीलों में विभाजित था। प्रत्येक कबीले का नेतृत्व एक शेख द्वारा किया जाता था, वह कुछ सीमा तक पारिवारिक संबंधों के आधार पर तथा व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता और उदारता (मुरव्वा) के आधार पर चुना जाता था। प्रत्येक कबीले के अपने स्वयं के अलग-अलग देवी-देवता होते थे, जो बुतों (सनम) के रूप में मस्जिदों में पूजे जाते थे। बहुत से अरब कबीले खानाबदोश या बद्दू अर्थात् बेदूइनी होते थे। ये लोग आमतौर पर मुख्यतः भोजन के खाद्य पदार्थ के रूप में खजूर और अपने ऊँटों के लिए चारे की तलाश में रेगिस्तान में सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे क्षेत्रों ( नखलिस्तानों) की ओर जाते रहते थे।
हम जानते हैं कि नखलिस्तानों में पानी के चश्मे (झील) तथा खजूर के पेड़ों के झुंड पाए जाते हैं। इन नखलिस्तानों के आसपास बेदूइनी छोटी-छोटी खेती करके अपनी आवश्यकतानुसार अनाज उत्पन्न कर लेते थे। अनाज का भूसा ऊँटों के चारे के काम में आता था।
अरब कबीलों में राजनीतिक विस्तार तथा सांस्कृतिक समानता लाना आसान काम नहीं था। उनमें परस्पर अपने-अपने कबीलों के वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रायः झगड़े होते रहते थे। अतः उनका जीवन संघर्षशील और युद्धों में उलझा हुआ था।
ऊँट उनके परिवहन का मुख्य साधन तथा सुख-दुख का साथी था। ऊँट के बिना रेगिस्तान में उनका जीवित रहना असंभव था। इसके अतिरिक्त बदूइओं का जीवन रेगिस्तान की शुष्क रेत के समान ही शुष्क बन गया था। नि:संदेह रेगिस्तान की जलवायु ने उन्हें कठोर तथा बर्बर बना दिया था। अरबों में मूर्तिपूजा का प्रचलन था। प्रत्येक कबीले के अपने देवी-देवता होते थे। इनकी बुतों (सनम) के रूप में मस्जिदों में पूजा की जाती थी। मक्का कबीलों का एक प्रसिद्ध स्थान था। साथ ही मक्का में कुरैश नामक कबीलों का अत्यधिक प्रभाव था। अरबों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धार्मिक केंद्र काबा भी यहीं पर स्थित था।