मराठी

वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए? - History (इतिहास)

Advertisements
Advertisements

प्रश्न

वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?

दीर्घउत्तर

उत्तर

  • वर्णित काल में कृषि के क्षेत्र में आए परिवर्तन
  1. करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के नए तरीके अपनाने शुरू कर दिए। उपज बढ़ाने का एक तरीका हल का प्रचलन था। जो छठी शताब्दी ई०पू० से ही गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में फैल गया था। जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी, वहाँ लोहे के फाल वाले हलों के माध्यम से उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी। इसके अलावा गंगा की घाटी में धान की रोपाई की वजह से उपज में भारी वृद्धि होने लगी।

  2. यद्यपि लोहे के फाल वाले हल की वजह से फसलों की उपज बढ़ने लगी, लेकिन ऐसे हलों का उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में सीमित था। पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क जमीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ। जो किसान उपमहाद्वीप के पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे उन्होंने खेती के लिए कुदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अधिक उपयोगी था।

  3. उपज बढ़ाने का एक और तरीका कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के माध्यम से सिंचाई करना था। कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन निर्मित किए। व्यक्तिगत तौर पर तालाबों, कुओं और नहरों जैसे सिंचाई साधन निर्मित करने वाले लोग प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे, जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया।

  4. यद्यपि खेती की इन नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी, लेकिन इसके लाभ समान नहीं थे। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद बढ़ता जा रहा था। कहानियों में विशेषकर बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े जमींदारों का उल्लेख मिलता है। पालि भाषा में गहपति का प्रयोग छोटे किसानों और जमीदारों के लिए किया जाता था। बड़े-बड़े जमींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली माने जाते थे, जो प्रायः किसानों पर नियंत्रण रखते थे। ग्राम प्रधान का पद प्रायः वंशानुगत होता था।

  5. आरंभिक तमिल संगम साहित्य में भी गाँवों में रहने वाले विभिन्न वर्गों के लोगों; जैसे-बड़े जमींदारों, हलवाहों और दासों का उल्लेख मिलता है। बड़े जमींदारों को ‘वेल्लार’, हलवाहों को ‘उझावर’ तथा दासों को ‘आदिमई’ कहा जाता था। यह संभव है कि वर्गों की इस विभिन्नता का कारण भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित हो। ऐसी परिस्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया। जिनकी चर्चा विधि ग्रंथों में प्रायः की जाती थी।

shaalaa.com
बदलता हुआ देहात
  या प्रश्नात किंवा उत्तरात काही त्रुटी आहे का?
पाठ 2: राजा, किसान और नगर - अभ्यास [पृष्ठ ५२]

APPEARS IN

एनसीईआरटी History [Hindi] Class 12
पाठ 2 राजा, किसान और नगर
अभ्यास | Q 9. | पृष्ठ ५२
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×