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आज नागरिक समाज संगठनों की क्या प्रासंगिकता है? - Sociology (समाजशास्त्र)

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Question

आज नागरिक समाज संगठनों की क्या प्रासंगिकता है?

Long Answer

Solution

नागरिक समाज उस व्यापक कार्यक्षेत्र को कहते हैं।

जो परिवार के निजी क्षेत्र से परे होता है किंतु राज्य तथा बाज़ार दोनों ही क्षेत्रों से बाहर होता है।

  • नागरिक समाज सार्वजनिक क्षेत्रों का गैर-राज्यीय तथा गैर-बाजारी हिस्सा ही है। इसमें व्यक्ति संस्थाओं तथा संगठनों के निर्माण के लिए एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं।
  • यह राष्ट्रीय नागरिकता का क्षेत्र है। व्यक्ति सामाजिक मुद्दों को उठाते हैं। सरकार को प्रभावित करने तथा अपनी माँगों को मनवाने की कोशिश करते हैं। अपने सामूहिक हितों को सरकार के समक्ष रखते हैं तथा विभिन्न मुद्दों पर लोगों का सहयोग माँगते हैं।
  • इसमें नागरिकों के समूहों के द्वारा बनाई गई स्वैच्छिक संस्थाएँ शामिल होती हैं। इसमें राजनीतिक दल, जनसंचार की संस्थाएँ, मजदूर संगठन, गैर सरकारी संगठन, धार्मिक संगठन तथा अन्य प्रकार के सामूहिक संगठन शामिल होते हैं।
  • नागरिक समाज के गठन की एक प्रमुख शर्त यह है कि यह राज्य द्वारा नियंत्रित नहीं होना चाहिए तथा यह विशुद्ध रूप से लाभ कमाने वाली संस्था नहीं होनी चाहिए।
  • उदाहरण के तौर पर दूरदर्शन नागरिक समाज का हिस्सा नहीं है जबकि अन्य निजी चैनल हैं। भारतीयों की सत्तावादी भावना का अनुभव आपातकाल के दौरान हुआ था जोकि जून 1975 से 1977 तक रहा था। आपातकाल के दौरान जबरदस्ती वंध्याकरण के कार्यक्रम चलाए गए, मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दी गई तथा सरकारी कर्मियों पर अनुचित दबाव डाला गया। इस तरह से नागरिक स्वतंत्रता का हनन कर दिया गया।

वर्तमान काल में नागरिक समाज

  • आज नागरिक समाज संगठनों की गतिविधियाँ विभिन्न मुद्दों को लेकर व्यापक स्वरूप ग्रहण कर चुकी हैं। इनमें राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय अभिकरणों के साथ तालमेल के साथ ही प्रचार करने तथा विभिन्न आंदोलनों में सक्रियतापूर्वक भाग लेना स्वाभाविक है।
  • नागरिक संगठनों के द्वारा जिन प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है, वे हैं- भूमि के अधिकारों के लिए जनजातीय संघर्ष, नगरीय शासन का हस्तातंरण, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा तथा बलात्कार के विरुद्ध आवाज, प्राथमिक शिक्षा में सुधार इत्यादि।
  • नागरिक समाज के क्रियाकलापों में जनसंचार के माध्यमों की भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
  • उदाहरण के तौर पर, सूचना के अधिकार को लिया जा सकता है। इसकी शुरुआत ग्रामीण राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में एक ऐसे आंदोलन के साथ हुई थी, जो वहाँ के गाँवों के विकास पर खर्च की गई सरकारी निधियों के बारे में सूचना देने के लिए चलाया गया था। आगे चलकर इस आंदोलन ने राष्ट्रीय अभियान का रूप ग्रहण कर लिया। नौकरशाही के विरोध के बावजूद सरकार को इस अभियान की सुनवाई करनी पड़ी तथा औपचारिक रूप से एक नया कानून बनाना पड़ा। इसके अंतर्गत नागरिकों के सूचना के अधिकार को मान्यता देनी पड़ी।
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राज्य और नागरिक समाज
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Chapter 6: सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ - प्रश्नावली [Page 147]

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NCERT Sociology [Hindi] Class 12
Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ
प्रश्नावली | Q 10. | Page 147
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