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Question
भारत के ग्रामीण विकास में ग्रामीण बैंकिंग व्यवस्था की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
Answer in Brief
Solution
बैंकिंग प्रणाली के तेजी से विस्तार का ग्रामीण कृषि एवं गैर कृषि उत्पादन, आय और रोजगार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। हरित क्रांति के बाद, ऋण सुविधाओं ने किसानों को अपनी उत्पादन आवश्यकता को पूरा करने के लिए ऋण की विविधताओं का लाभ उठाने में मदद की। अनाज के सुरक्षित भंडारों के चलते अकाल अतीत की घटना बन चुके हैं। तब भी ग्रामीण बैंकिंग द्वारा निम्नलिखित समस्याओं का सामना किया जा रहा है
- अपर्याप्तता- देश में उपलब्ध ग्रामीण साख की मात्रा उसकी माँग की तुलना में आज भी बेहद अपर्याप्त है।
- संस्थागत स्रोतों की अपर्याप्त कवरेज- संस्थागत ऋण व्यवस्था असफल रही है क्योंकि यह पूरे देश के ग्रामीण किसानों को कवर करने में विफल रहा है।
- अपर्याप्त राशि की मंजूरी- किसानों के लिए मंजूर ऋण की राशि भी अपर्याप्त है।
- सीमांत या निर्धन किसानों की ओर कम ध्यान- जरूरतमंद किसानों की ऋण आवश्यकताओं पर कम ध्यान दिया गया है।
- बढ़ती देय राशि- कृषि ऋण में अतिदेय राशि की समस्या चिंता का एक विषय बना हुआ है। लंबे समय से कृषि ऋण का भुगतान न कर पाने वालों की दरों में वृद्धि हुई है। 50% से अधिक उधारकर्ताओं को जानबूझकर ऋण का भुगतान न करने वालों की श्रेणी में रखा गया है। यह बैंकिंग प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए एक खतरा है और इसे नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।
सुधारों के बाद से कृषि बैंकिंग क्षेत्र के विस्तार एवं वृद्धि ने एक पिछला स्थान ले लिया है। वाणिज्यिक बैंकों के अतिरिक्त अन्य औपचारिक संस्थान जमा संग्रहण की एक संस्कृति, ज़रूरतमदों के लिए ऋण एवं प्रभावी ऋण वसूली करने में विफल रहे हैं।
- परिस्थिति में सुधार करने के लिए
- बैकों का अपना दृष्टिकोण केवल उधारदाताओं से बदलकर बैंकिंग संबंधों के निर्माण के रूप में बनाया जाना चाहिए।
- किसानों को बचत और वित्तीय संसाधनों के कुशल उपयोग की आदत विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
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ग्रामीण क्षेत्रकों में साख और विपणन
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