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Question
भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि : “चूंकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है…बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं…(वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।” चर्चा कीजिए।
Solution
महाभारत प्राचीन भारत का एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण महाकाव्य है। आज भी भारतीय जन-जीवन पर इसका अगाध प्रभाव है। तत्कालीन जन-जीनव के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं का सजीव चित्रण इस महाकाव्य में किया गया है। भारतीय साहित्य के सुप्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा था, “चूंकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है… बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं… यह हमें भारतीय जनसामान्य की आत्मा की अगाध गहराई का दिग्दर्शन कराता है।” उल्लेखनीय है कि महाभारत काल तक आर्यों का संपूर्ण भारत में विस्तार हो चुका था। सभी स्थानों पर आर्यों के विभिन्न कुल राज्य कर रहे थे। कौरवों और पांडवों का संघर्ष धर्म और अधर्म का, औचित्य और अनौचित्य को संघर्ष है। पांडव धर्म और औचित्य के तथा कौरव अधर्म एवं अनौचित्य के प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण, जिन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है, इसी कारण पांडवों का समर्थन करते हैं।
इस संघर्ष में पांडवों की कौरवों पर विजय वास्तव में धर्म की अधर्म पर विजय है। धर्म और अधर्म के इस संघर्ष में विभिन्न पात्रों एवं कथानकों के माध्यम से भारतीय जनमानस को धर्म के मार्ग की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया गया है। इसीलिए तो गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को पांडवों से युद्ध न करने की सलाह देते हुए कहती है, “शांति की संधि करके तुम अपने पिता, मेरा और अपने शुभेच्छुकों का सम्मान करोगे…। विवेकी पुरुष जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है वही अपने राज्य की रखवाली करती है। लालच एवं क्रोध मनुष्य को लाभ से दूर खदेड़ ले जाते हैं। इन दोनों शत्रुओं को पराजित कर राजा संपूर्ण पृथ्वी को जीत सकता है… हे पुत्र, तुम विवेकी और वीर पांडवों के साथ सानंद इस पृथ्वी का भोग करोगे… युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता। न धर्म और अर्थ की प्राप्ति होती है और न ही प्रसन्नता की। युद्ध के अंत में सफलता मिले यह भी निश्चित नहीं… अपने मन को युद्ध में लिप्त मत करो।” इतिहास साक्षी है कि दुर्योधन ने अपनी माता की सलाह की उपेक्षा की और भाग्य ने उसकी।
उसने युद्ध लड़ा और पराजित होकर सर्वनाश को प्राप्त हो गया। महाभारत में भारतीय शिष्टाचार का आदर्श रूप देखने को मिलता है। धर्मपुत्र युधिष्ठिर भारतीय शिष्टाचार का सजीव उदाहरण हैं, जैसा कि महाभारत के निम्नलिखित अवतरण से स्पष्ट होता है। इसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर, जो धर्मपुत्र के नाम से प्रसिद्ध हुए, संजय को संबोधित करते हुए कहते हैं“संजय, धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ… मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं… सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं… मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रमाण करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”.. मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा… सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा।
दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहायजनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा…।” । वास्तव में शिष्टाचार का यह नमूना स्वयं में अद्वितीय है। इसमें आयु, लिंग और बंधुत्व भाव के साथ-साथ कुलीनता, प्रेम, सुंदरता, दासता, विकलांगता और असहायता के आधार पर सभी के प्रति शिष्टाचार प्रकट किया गया है। युधिष्ठिर ने सबसे पहले ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित का अभिवादन किया, क्योंकि उनकी स्थिति समाज में सर्वोच्च थी। तत्पश्चात् उन्होंने अपने गुरु द्रोणाचार्य का नतमस्तक अभिवादन करने की बात कही और फिर कृपाचार्य एवं कुरु वंश के प्रमुख भीष्म पितामह के चरण स्पर्श की, क्योंकि भीष्म आयु में सबसे बड़े और योग्यता की दृष्टि से आदरणीय थे। भीष्म पितामह के अभिवादन के बाद उन्होंने कौरवों के पिता और अपने संबंधी हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र को नमन किया। युधिष्ठिर ने दुर्योधन की दुर्भावनाओं को भुलाकर कौरवों के स्वास्थ्य के विषय में पूछा तथा उन्हें अपनी शुभकामनाएँ भी भेजीं। वे युवा कुरु योद्धाओं को भी नहीं भूले और उन्होंने महामति विदुर का भी सम्मानपूर्वक अभिवादन किया।
अंत में युधिष्ठिर ने वर्ण-व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर स्थित दास, दासियों, विकलांगों, असहायों आदि के प्रति भी अपना अभिवादन भेजा। इस प्रकरण से जहाँ एक ओर युधिष्ठिर की शालीनता एवं विनम्रता का परिचय मिलता है, वहीं यह भी स्पष्ट होता है कि वह वर्ण-व्यवस्था द्वारा स्थापित मानदंडों का पालन करते थे। वास्तव में महाभारत का मूल उद्देश्य भारतीय समाज एवं संस्कृति को जीवन की कुछ मूल मान्यताओं की ओर आकर्षित करना है। महाभारत की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ है जो संपूर्ण भारतीय दर्शन का निचोड़ है। इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों-ज्ञान, कर्म और भक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत का सर्वाधिक महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इससे हमें उत्तर वैदिक काल के बाद की कुछ शताब्दियों की सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशा को जानने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। नि:संदेह राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भारतीय जीवन पर इस महाकाव्य का गंभीर प्रभाव रहा है।
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निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं
“संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य का चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा ( धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ…मैं उन सब कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं… सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनको जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं…मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पलियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”…मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा…सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध , विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा….” ।
इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए-उम्र, लिंग-भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार भी हैं? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?
क्या यह संभव है कि महाभारत को एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।