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चाक्षुष क्षेत्र के प्रत्यक्षण के संबंध में गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों की प्रमुख प्रतिज्ञप्ति क्या है? - Psychology (मनोविज्ञान)

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Question

चाक्षुष क्षेत्र के प्रत्यक्षण के संबंध में गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों की प्रमुख प्रतिज्ञप्ति क्या है?

Long Answer

Solution

ज्ञानेंद्रियों के उद्दीपन के परिणामस्वरूप हम प्रकाश की क्षणदीप्ति अथवा ध्वनि अथवा प्राण का अप क करते हैं। यह प्रारंभिक अनुभव जिसे संवेदना कहते हैं, हमें ज्ञानेंद्रियों को उद्दीप्त करने वाले उद्दोपक की समझ प्रदान नहीं करता है। उदाहरण के लिए, हमें इससे प्रकाश, ध्वनि एवं साध के स्रोत के विषय में जानकारी नहीं मिलती है। संवेदी तंत्र द्वारा प्रदान की गई कच्ची सामग्री से अर्थ प्राप्त करने के लिए हम इसका पुनः प्रक्रमण करते हैं। ऐसा करने से हम अपने अधिगम, कि अभिप्रेरणा, संवेग तथा अन्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के उपयोग हारा उद्दीपकों को अर्थवान बनाते हैं। जिस प्रक्रिया से हम ज्ञानेंद्रियों द्वारा प्रदान की गई सूचनाओं की पहचान करते हैं, व्याख्या अथवा उसको अर्थवान बनाते हैं, उसे प्रत्यक्षण कहा जाता है। उद्दीपकों अथवा घटनाओं की व्याख्या करने में लोग अपने ढंग से उनको रचित करते हैं। इस प्रकार, प्रत्यक्षण बाह्य अथवा आंतरिक जगत में पाए जाने वाली वस्तुओं अथवा घटनाओं की व्याख्या मात्र नहीं है, बल्कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार वस्तुओं या घटनाओं को एक रचना भी है। अर्थात्‌ बनाने की प्रक्रिया में कुछ उपक्रियाएँ अन्तर्निहित हैं।

प्रत्याक्षण के प्रक्रमण उपागम :
हम किसी वस्तु की पहचान कैसे करते हैं ? क्या हम किसी कुत्ते की पहचान इसलिए करते हैं कि हम उसके रोएँदार खाल, उसके चार पैरों, उसकी आँखों, कानों आदि की पहचान पहले कर चुके हैं अथवा इन अंगों की पहचान हम इसलिए करते हैं क्योंकि पहले हमने कुत्ते की पहचान की है ? यह विचार कि प्रत्यभिज्ञान प्रक्रिया अंशों से प्राप्त होती है और जो समग्र प्रत्यभिज्ञान का आधार बनती है, उसे ऊर्ध्वगामी प्रक्रमण (bottom-up processing) कहते हैं। जब प्रत्यभिज्ञान प्रक्रिया समग्र से प्रारंभ होती है तो उसके आधार पर विभिन्न घटकों की पहचान की जाती है तो उसे अधोगामी प्रक्रमण (top-down processing) कहते हैं।

ऊर्ध्वगामी उपागम प्रत्यक्षण उद्दीपकों के विविध लक्षणों पर जोर देता है तथा प्रत्यक्षण को एक मानसिक रचना की प्रक्रिया स्वीकार करता है। अधोगामी उपागम प्रत्यक्षण करने वालों को महत्त्व देता है तथा प्रत्यक्षण को उद्दीपकों की प्रत्यभिज्ञान अथवा तदात्मीकरण की प्रक्रिया माना जाता है। अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि प्रत्यक्षण में दोनों प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से अंतः क्रिया करती हैं और हमें जगत की समझ प्रदान करती हैं।

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Chapter 5: संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ - समीक्षात्मक प्रश्न [Page 109]

APPEARS IN

NCERT Psychology [Hindi] Class 11
Chapter 5 संवेदी, अवधानिक एवं प्रात्यक्षिक प्रक्रियाएँ
समीक्षात्मक प्रश्न | Q 7. | Page 109
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