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द्रोण, हिडिंबा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए वे अपने उत्तर को भी स्पष्ट कीजिए। - History (इतिहास)

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Question

द्रोण, हिडिंबा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए वे अपने उत्तर को भी स्पष्ट कीजिए।

Long Answer

Solution

  1. द्रोण की कथा और धार्मिक मानदंड-
    द्रोण के पास एकलव्य नामक वनवासी निषाद (शिकारी समुदाय) आया। द्रोण, जो धर्म समझते थे, उसके अनुसार उन्होंने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया। एकलव्य ने वन में लौटकर मिट्टी से द्रोण की प्रतिमा बनाई और उसे अपना गुरु मानकर वह स्वयं ही तीर चलाने का अभ्यास करने लगा। समय के साथ वह तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया। बहुत दिन बाद एक दिन कुरु राजकुमार अपने कुत्ते के साथ जंगल में शिकार करते हुए एकलव्य के समीप पहुँच गए। कुत्ता काले मृग की चमड़ी के वस्त्र में लिपटे निषाद को देखकर भौंकने लगा। एकलव्य ने एक साथ सात तीर चलाकर उसका मुँह बंद कर दिया। जब वह कुत्ता लौटा तो पांडव तीरंदाजी का यह अद्भुत द्रोण ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के सामने यह प्रण किया था कि उसे वे विश्व के अद्वितीय तीरंदाज बनाएँगे। इस दृश्य को देखकर अर्जुन ने द्रोण को उनका प्रण याद दिलाया। द्रोण एकलव्य के पास गए।

    उसने उन्हें अपना गुरु मानकर प्रणाम किया। तब द्रोण ने गुरुदक्षिणा के रूप में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। एकलव्य ने फौरन गुरु को अपना अँगूठा काट कर दे दिया। अब एकलव्य तीर चलाने में उतना तेज़ नहीं रहा, इस तरह द्रोण ने अर्जुन को दिए वचन को निभाया। कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा। हालाँकि गुरु को ऐसा नहीं करना चाहिए। टिप्पणी-उपर्युक्त कथा से दो बातें स्पष्ट हैं कि द्रोण एक ब्राह्मण थे। उनका काम शिक्षा देना था और वर्ण-व्यवस्था के अनुसार सैनिक दायित्व का निर्वाह क्षत्रिय ही करते थे। द्रोण के शिष्य पांडव और कौरव क्षत्रिय थे। वे उन्हें धर्मसूत्र या वर्ण-व्यवस्था द्वारा निर्धारित धर्म का अनुसरण करते हुए धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे। दूसरी बात इस कहानी के द्वारा निषादों को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे वनवासी आदिवासी हैं। अतः वे वर्ण-व्यवस्था के अनुसार उच्च वर्गों की बराबरी का दावा नहीं कर सकते।

  2. हिडिंबा की कथा और धार्मिक मानदंड-
    पांडव गहन वन में चले गए थे। थककर वे सो गए। केवल वितीय पांडव भीम जो अपने बल के लिए प्रसिद्ध थे, रखवाली कर रहे थे। एक नरभक्षी राक्षस को पांडवों की मानुष गंध ने विचलित किया और उसने अपनी बहन हिडिंबा को उन्हें पकड़कर लाने के लिए भेजा। हिडिंबा भीम को देखकर मोहित हो गई और एक सुंदर स्त्री के वेष में उसने भीम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इस बीच राक्षस वहाँ आ गया और उसने भीम को युद्ध के लिए ललकारा। भीम ने उसकी चुनौती को स्वीकार किया और उसका वध कर दिया। शोर सुनकर अन्य पांडव जाग गए। हिडिंबा ने उन्हें अपना परिचय दिया और भीम के प्रति अपने प्रेम से उन्हें अवगत कराया। वह कुंती से बोली-“हे उत्तम देवी, मैंने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है।

    और आपके बाघ सदृश पुत्र का अपने पति के रूप में चयन किया है…चाहे आप मुझे मूर्ख समझे अथवा अपनी समर्पित दासी, कृपया मुझे अपने साथ लें, तथा आपका पुत्र मेरा पति हो।” अंततः युधिष्ठिर इस शर्त पर विवाह के लिए तैयार हो गए कि भीम दिनभर हिडिंबा के साथ रहकर रात्रि में उनके पास आ जाएँगे। दोनों का विवाह संपन्न हुआ। हिडिंबा ने एक राक्षस पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम घटोत्कच रखा गया। तत्पश्चात् माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए किंतु घटोत्कच ने यह प्रण किया कि जब भी पांडवों को उसकी जरूरत होगी वह उपस्थित हो जाएगा। टिप्पणी-कुछ इतिहासकारों का यह मत है कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार उन मानदंडों से भिन्न थे जिनका चित्रण ब्राहमणीय ग्रंथों में हुआ था।

  3.  मातंग की कथा और धार्मिक मानदंड-
    एक बार बोधिसत्व ने बनारस नगर के बाहर एक चांडाल के पुत्र के रूप में जन्म लिया, उनका नाम मातंग था। एक दिन वे किसी कार्यवश नगर में गए और वहाँ उनकी मुलाकात दिथ्थ मांगलिक नामक एक व्यापारी की पुत्री से हुई। उन्हें देखकर वह चिल्लाई, “मैंने कुछ अशुभ देख लिया है।” यह कहकर उसने अपनी आँखें धोईं। उसके क्रोधित सेवकों ने मातंग की पिटाई की। विरोध में मातंग व्यापारी के घर के दरवाजे के बाहर जाकर लेट गए। सातवें रोज घर के लोगों ने बाहर आकर दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया। दिथ्थ उपवास से क्षीण हुए मातंग को लेकर चांडाल बस्ती में आई। घर लौटने पर मातंग ने संसार त्यागने का निर्णय लिया। अलौकिक शक्ति हासिल करने के उपरांत वह बनारस लौटे और उन्होंने दिथ्थ से विवाह कर लिया। माण्डव्यकुमार नामक उनका एक पुत्र हुआ।

    बड़े होने पर उसने तीन वेदों का अध्ययन किया तथा प्रत्येक दिन वह 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था। एक दिन फटे वस्त्र पहने तथा मिट्टी का भिक्षापात्र हाथ में लिए मातंग अपने पुत्र के दरवाजे पर आये और उन्होंने भोजन माँगा। उन्हें देखकर माण्डव्य ने कहा कि तुम देखने से एक पतित प्रतीत होते हो, अतः तुम भिक्षा के यीग्य नहीं हो। भोजन ब्राह्मणों के लिए है। मातंग ने उत्तर दिया, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।” माण्डव्य ने क्रोधित होकर अपने सेवकों से मातंग को घर से बाहर निकालने को कहा। मातंग आकाश में जाकर अदृश्य हो गए। जब दिथ्थ मांगलिक को इस प्रसंग के बारे में पता चला तो वह उनसे माफी माँगने के लिए उनके पीछे आई। टिप्पणी-उपर्युक्त कथा से यह पता चलता है कि लोग महान धार्मिक संत या भिक्षु को भी उसके निम्न वर्ण या जाति से संबंधित होने के कारण उसके साथ घृणा और तिरस्कार का व्यवहार करते थे। हालाँकि बोधिसत्व मातंग की अलौकिक शक्ति को देखने के बाद विशिष्ट परिजन उनसे क्षमायाचना करते हैं।

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सामाजिक विषमताएँ वर्ण व्यवस्था के दायरे में और उससे परे
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Chapter 3: बंधुत्व, जाति तथा वर्ग - अभ्यास [Page 80]

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NCERT History [Hindi] Class 12
Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग
अभ्यास | Q 3. | Page 80
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