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एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आए। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। - Political Science (राजनीति विज्ञान)

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Question

एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस मसले पर कई विचार सामने आए। एक विचार यह था कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है। उसे किसी राजनीतिक दल में होने और चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसे विकल्प की सम्भावना कायम रखने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता प्रभावित होगी। इस कारण, भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप इसमें किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?

Answer in Brief

Solution 1

भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी दल का सदस्य बन सकता है। और उस दल के टिकट पर चुनाव भी लड़ सकता है। श्री टी० एन० शेषन ने सेवानिवृत्त होने के बाद ऐसा किया था। इसमें कोई दोष नहीं है। किसी राजनीतिक दल के सदस्य को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करना उचित नहीं है क्योंकि ऐसे व्यक्ति से निष्पक्षता से निर्णय लेने और कार्य करने की आशा नहीं की जा सकती। परन्तु सेवानिवृत्ति के बाद अपने विचार प्रकट करना, किसी दल को अपनाना, चुनाव लड़ना उसका अधिकार भी है और इससे चुनावों की स्वतन्त्रता तथा निष्पक्षता पर कोई आँच नहीं आती। सेवानिवृत्त होने के बाद भारत का मुख्य न्यायाधीश भी ऐसा कर सकता है।

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Solution 2

चुनाव आयुक्तों को पद छोड़ने के बाद चुनाव नहीं लड़ना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसे अपने आचरण में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सत्यनिष्ठा के उच्चतम मानकों की आवश्यकता होती है। चुनाव आयुक्त का कार्य निष्पक्ष रूप से चुनावों के संचालन की निगरानी और सुरक्षा करना है और चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना है।

चुनावी राजनीति में चुनाव आयुक्त जैसे वैधानिक अधिकारी के शामिल होने की कोई भविष्य की संभावना देश में लोकतांत्रिक परंपरा की आधारशिला एक संस्था की अखंडता और निष्पक्षता से गंभीर रूप से समझौता करेगी। यह प्रथा एक मिसाल कायम करेगी जो चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को कम करेगी और चुनाव के संचालन में पूर्वाग्रह के आरोपों के लिए उत्तरदायी होगी। ऐसी स्थिति लंबे समय में राजनीति के लिए अस्वस्थ होगी क्योंकि यह उच्चतम स्तरों पर चुनावी कदाचार के संपर्क में आएगी। यह मिसाल चुनावों को एक ऐसी शर्मनाक कवायद में बदलने का एक वास्तविक खतरा पैदा करेगी जो भविष्य की तारीख में चुनाव आयुक्तों के लिए पद के प्रलोभन के लिए बंधक होगी।

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भारत में चुनाव व्यवस्था
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Chapter 3: चुनाव और प्रतिनिधित्व - प्रश्नावली [Page 77]

APPEARS IN

NCERT Political Science [Hindi] Class 11
Chapter 3 चुनाव और प्रतिनिधित्व
प्रश्नावली | Q 9. | Page 77

RELATED QUESTIONS

निम्नलिखित में कौन-सा कथन गलत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द अथवा पद को बदलकर, जोड़कर अथवा नए क्रम में सजाकर इसे सही करें-

(क) एक फर्स्ट-पोस्ट-द-पोस्ट प्रणाली (‘सबसे आगे वाला जीते प्रणाली’) का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) चुनाव आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत का राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकता।
(घ) चुनाव आयोग में एक से ज्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।


एक नए देश के संविधान के बारे में आयोजित किसी संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित आशाएँ जतायीं। प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि उनके लिए फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली) उचित होगी या समानुपातिक प्रतिनिधित्व वाली प्रणाली?

  1. लोगों को इस बात की साफ-साफ जानकारी होनी चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है। ताकि वे उसे निजी तौर पर जिम्मेदार ठहरा सकें।
  2. हमारे देश में भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं और देशभर में फैले हैं, हमें इनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी को सुनिश्चित करना चाहिए।
  3. विभिन्न दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं रखनी चाहिए।
  4. लोग किसी अच्छे प्रत्याशी को चुनने में समर्थ होने चाहिए भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों।

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