Advertisements
Advertisements
Question
घडी के पुर्जे
धर्म संबंधी अपनी मान्यता पर लेख/निबंध लिखिए।
Long Answer
Solution
धर्म शब्द को लेकर लोगों में रूढ़िवादिता का रुख प्राय: देखने को मिलता है। लोग धर्म के प्रति कट्टर होते हैं। उनके धर्म के विषय में कोई मज़ाक भी कर ले, तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। परन्तु इसके विपरीत हकीकत कुछ और ही है। उनसे यदि पूछा जाए कि धर्म की परिभाषा क्या है, तो बगलें झाँकने लगते हैं। आज धर्म की सीमा पूजा-पाठ, नमाज, वर्त-रोज़े, हज तथा तीर्थयात्रा तक सिमटकर रह गई है। लोगों को वही धर्म नज़र आता है। उसे ही सब मानकर वह दूसरे लोगों के विरोधी हो जाते हैं और साप्रंदायिकता अलगाव तथा धार्मिक भेदभाव को जन्म दे देते हैं।
एक शिशु को बड़े होने तक हर तरह के संस्कार सिखाए जाते हैं। उसे धार्मिक होना सिखाया जाता है। परन्तु धर्म का अर्थ कहीं पीछे छोड़ दिया जाता है। इस शब्द का अर्थ दिखने में जितना पेचीदा है, उतना ही सरल है। परेशानी में पड़े किसी मनुष्य की सहायता करना, दीन-दुखियों की सेवा करना, परोपकार करना, गरीब को खाना खिलाना, सत्य के मार्ग पर चलना, अन्याय का विरोध करना इत्यादि बातें ही मनुष्य का धर्म है। परन्तु हम जीवन में इस सबको छोड़कर बेकार के आंडबरों में पड़कर मानवता से विमुख हो रहे हैं।
मेरा मानना है, जो मनुष्य किसी असहाय को सिर्फ इसलिए छोड़कर आगे बढ़ जाता है कि यह मेरा काम नहीं है, मैं किसी मुसीबत में फंसना नहीं चाहता या मेरे पास समय नहीं है, वही मनुष्य अधर्मी कहलाने योग्य है। हम दस हट्टे-कट्टे लोगों को धर्म के नाम पर या दान के नाम पर कपड़े या भोजन बाँटते हैं और एक मुसीबत में पड़े व्यक्ति को छोड़कर निकल जाते हैं, तो यह धर्म नहीं है। ये अन्याय है और यही अधर्म है।
मैंने सदैव ही धर्म के विषय में समझने का प्रयास किया और पाया कि असहायों की मदद करने में जो सच्चा सुख है, वह पुजा-पाठ, यात्रा तथा दान करने में नहीं है। महाभारत का युद्ध भी धर्म और अधर्म का युद्ध था। कौरवों ने जो किया वह न्यायसंगत नहीं था। पांडवों का राज्य हड़प लेना और उन्हें अपमानित तथा मारने का प्रयास करना भी अधर्म ही था। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने पांडवों का साथ दिया। उन्होंने धर्म की रक्षा की। परन्तु इसे किसी संप्रदाय से जोड़ना अनुचित है।
मेरा मानना है, जो मनुष्य किसी असहाय को सिर्फ इसलिए छोड़कर आगे बढ़ जाता है कि यह मेरा काम नहीं है, मैं किसी मुसीबत में फंसना नहीं चाहता या मेरे पास समय नहीं है, वही मनुष्य अधर्मी कहलाने योग्य है। हम दस हट्टे-कट्टे लोगों को धर्म के नाम पर या दान के नाम पर कपड़े या भोजन बाँटते हैं और एक मुसीबत में पड़े व्यक्ति को छोड़कर निकल जाते हैं, तो यह धर्म नहीं है। ये अन्याय है और यही अधर्म है।
मैंने सदैव ही धर्म के विषय में समझने का प्रयास किया और पाया कि असहायों की मदद करने में जो सच्चा सुख है, वह पुजा-पाठ, यात्रा तथा दान करने में नहीं है। महाभारत का युद्ध भी धर्म और अधर्म का युद्ध था। कौरवों ने जो किया वह न्यायसंगत नहीं था। पांडवों का राज्य हड़प लेना और उन्हें अपमानित तथा मारने का प्रयास करना भी अधर्म ही था। यही कारण था कि श्रीकृष्ण ने पांडवों का साथ दिया। उन्होंने धर्म की रक्षा की। परन्तु इसे किसी संप्रदाय से जोड़ना अनुचित है।
shaalaa.com
पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी
Is there an error in this question or solution?
APPEARS IN
RELATED QUESTIONS
बालक बच गया
बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विकास में 'रटना' बाधक है- कक्षा में संवाद कीजिए।
बालक बच गया
ज्ञान के क्षेत्र में 'रटने' का निषेध है किंतु क्या आप रटने में विश्वास करते हैं। अपने विचार प्रकट कीजिए।
घडी के पुर्जे
'धर्म का रहस्य जानना सिर्फ़ धर्माचार्यों का काम नहीं, कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर उस रहस्य को जानने की कोशिश कर सकता है, अपनी राय दे सकता है'- टिप्पणी कीजिए।
ढेले चुन लो
समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में धर्म, विश्वास और आस्था पर निबंध लिखिए।
अपने घर में या आस-पास दिखाई देने वाले किसी रिवाज या अंधविश्वास पर एक लेख लिखिए।