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कंपनियाँ और ठेकेदार पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन कैसे कर पाते हैं? - Social Science (सामाजिक विज्ञान)

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Question

कंपनियाँ और ठेकेदार पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन कैसे कर पाते हैं?

Answer in Brief

Solution

कंपनियाँ और ठेकेदार पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन कर पाते हैं, क्योंकि - 

  1. पर्यावरण की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को ईमानदारी से लागू नहीं किया जा रहा है।
  2. सरकारी अधिकारी रिश्वत लेकर कंपनियों व ठेकेदारों को मनमानी करने की छूट दे देते हैं।
  3. यदि कंपनियाँ या ठेकेदार कानून तोड़ते पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ उचित कार्यवाही नहीं की जाती है।
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पर्यावरण की रक्षा के लिए नए कानून
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Chapter 10: कानून और सामाजिक न्याय - पाठ में [Page 128]

APPEARS IN

NCERT Civics [Hindi] Class 8
Chapter 10 कानून और सामाजिक न्याय
पाठ में | Q 8 | Page 128

RELATED QUESTIONS

इस इकाई में आपने सरकार की विभिन्न भूमिकाओं के बारे में पढ़ा है। इनके बारे में एक अनुच्छेद लिखें।


पहले पर्यावरण को किस तरह देखा जाता था? क्या अब सोच में कोई बदलाव आया है? चर्चा करें।


प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण इस कार्टून के जरिए क्या कहना चाह रहे हैं? इसका 2006 में बनाए गए इस कानून से क्या संबंध है जिसको पृष्ठ 123 पर आपने पढ़ा था। 


‘स्वच्छ वातावरण एक जनसुविधा है’, क्या आप इस बयान की व्याख्या कर सकते हैं?


हमें नए कानूनों की जरूरत क्यों है?


जनसुविधा के रूप में पर्यावरण
हाल के वर्षों में न्यायालयों ने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर कई कड़े आदेश दिए हैं। ऐसे कई आदेशों से लोगों की रोजी-रोटी पर भी बुरा असर पड़ा है।

मिसाल के तौर पर, अदालत ने आदेश दिया कि दिल्ली के रिहायशी इलाकों में काम करने वाले उद्योगों को बंद कर दिया जाए या उन्हें शहर से बाहर दूसरे इलाकों में भेज दिया जाए। इनमें से कई कारखाने आसपास के वातावरण को प्रदूषित कर रहे थे। इन कारखानों की गंदगी से यमुना नदी भी प्रदूषित हो रही थी, क्योंकि इन कारखानों को नियमों के हिसाब से नहीं चलाया जा रहा था।

अदालत की कार्रवाई से एक समस्या तो हल हो गई, लेकिन एक नई समस्या पैदा भी हो गईं कारखानों के बंद हो जाने से बहुत सारे मज़दूरों के रोजगार खत्म हो गए। बहुतों को दूर-दराज के इलाकों में जाना पड़ा। जहाँ उन कारखानों को दोबारा चालू किया गया था। अब प्रदूषण की समस्या इन नए इलाकों में पैदा हो रही है ये इलाके प्रदूषित होने लगे हैं। मजदूरों की सुरक्षा संबंधी स्थितियों का मुद्दा अभी भी वैसा का वैसा है।

भारत में पर्यावरणीय मुद्दों पर हुए ताज़ा अनुसंधानों से यह बात सामने आई है कि मध्य वर्ग के लोग पर्यावरण की चिंता तो करने लगे हैं, लेकिन वे अक्सर गरीबों की पीड़ा को ध्यान में नहीं रखते। इसलिए उनमें से बहुतों को यह तो समझ में आता है कि शहर को सुंदर बनाने के वास्ते बस्तियों को हटाना चाहिए या प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को शहर के बाहर ले जाना चाहिए, लेकिन यह समझ में नहीं आता कि इससे बहुत सारे लोगों की रोजी-रोटी भी खतरे में पड़ सकती है। जहाँ एक तरफ स्वच्छ पर्यावरण के बारे में जागरूकता बढ़ रही है वहीं दूसरी तरफ मजदूरों की सुरक्षा के बारे में लोग ज्यादा चिंता नहीं जता रहे हैं।

अब चुनौती ऐसे समाधान ढूंढने की है, जिनमें स्वच्छ वातावरण का लाभ सभी को मिल सके। इसका एक तरीका यह है कि हम कारखानों में ज्यादा स्वच्छ तकनीकों और प्रक्रियाओं को अपनाने पर जोर दें। इसके लिए सरकार को भी चाहिए कि वह कारखानों को प्रोत्साहन और मदद दे। उसे प्रदूषण फैलाने वालों पर जुर्माना करना होगा। इस तरह मजदूरों के रोजगार भी बच जाएँगे और समुदायों व मजदूरों को सुरक्षित पर्यावरण का अधिकार भी मिल जाएगा। 

क्या आपको लगता है कि ऊपर उद्धत मामले में सभी पक्षों को न्याय मिला है?


क्या आपको पर्यावरण की रक्षा के और तरीके दिखाई देते हैं? कक्षा में चर्चा करें।


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