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'लोगों के सक्रिय सहभाग से ही समाज सुधारक का कार्य सफल हो सकता है', इस विषय पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए। - Hindi

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Question

'लोगों के सक्रिय सहभाग से ही समाज सुधारक का कार्य सफल हो सकता है', इस विषय पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए।

Short Note

Solution

समाज सुधार कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। इसका दायरा विशाल है। इस कार्य को करने का बीड़ा उठाने वाले को इस कार्य में निरंतर रत रहना पड़ता है। किसी भी अकेले व्यक्ति के वश का यह काम नहीं है। इस कार्य को सुचारु रूप से संपन्न करने के लिए समाज सुधारक को समाज के प्रतिनिधियों एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं का सहयोग लेना आवश्यक होता है। समाज में तरह तरह की विकृतियाँ होती हैं। उनके बारे में जानकारी करने और उन्हें दूर करने के लिए समाज के लोगों का सहयोग प्राप्त करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त किसी भी सामाजिक बुराई के पीछे विभिन्न कारणों से कुछ लोगों का स्वार्थ भी होता है। ऐसे लोगों से निपटे बिना उसे दूर नहीं किया जा सकता। बिना लोगों के सक्रिय सहयोग से ऐसे समाज विरोधी तत्वों से पार पाना संभव नहीं हो पाता। इसलिए इन सभी बातों को ध्यान में रखकर समाज सुधारक को लोगों का सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक है। लोगों के सक्रिय सहयोग से ही वह अपने कार्य में सफल हो सकता है।

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पाप के चार हथियार
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Chapter 6: पाप के चार हथि यार - अभिव्यक्ति [Page 34]

APPEARS IN

Balbharati Hindi - Yuvakbharati 12 Standard HSC Maharashtra State Board
Chapter 6 पाप के चार हथि यार
अभिव्यक्ति | Q 2 | Page 34

RELATED QUESTIONS

कृति पूर्ण कीजिए:

पाप के चार हथियार ये हैं -

(१) ____________

(२) ____________

(३) ____________

(4) ____________


कृति पूर्ण कीजिए:

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का कथन - ____________


'समाज सुधारक समाज में व्याप्त बुराइयों को पूर्णतः समाप्त करने में विफल रहे', इस कथन पर ना मत प्रकट कीजजए।


निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर लगभग ८० से १०० शब्दों में लिखिए।

‘पाप के चार हथियार’ पाठ का संदेश लिखिए।


‘पाप के चार हथियार’ निबंध का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।


निम्नलिखित प्रश्‍न का मात्र एक वाक्य में उत्तर लिखिए:

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी के निबंध संग्रहों के नाम लिखिए।


लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी की भाषा शैली - __________________


निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए: 

‘‘वे मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकते, यदि मुझपर हँसें नहीं। मेरी मानसिक और नैतिक महत्ता लोगों के लिए असहनीय है। उन्हें उबाने वाली खूबियों का पुंज लोगों के गले के नीचे कैसे उतरे? इसलिए मेरे नागरिक बंधु या तो कान पर उँगली रख लेते हैं या बेवकूफी से भरी हँसी के अंबार के नीचे ढँक देते हैं मेरी बात।’’ शॉ के इन शब्दों में अहंकार की पैनी धार है, यह कहकर हम इन शब्दों की उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें संसार का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सत्य कह दिया गया है।

संसार में पाप है, जीवन में दोष, व्यवस्था में अन्याय है, व्यवहार में अत्याचार... और इस तरह समाज पीड़ित और पीड़क वर्गों में बँट गया है। सुधारक आते हैं, जीवन की इन विडंबनाओं पर घनघोर चोट करते हैं। विडंबनाएँ टूटती-बिखरती नजर आती हैं पर हम देखते हैं कि सुधारक चले जाते हैं और विडंबनाएँ अपना काम करती रहती हैं।

आखिर इसका रहस्य क्या है कि संसार में इतने महान पुरुष, सुधारक, तीर्थंकर, अवतार, संत और पैगंबर आ चुके पर यह संसार अभी तक वैसा-का-वैसा ही चल रहा है।

(१) आकृति पूर्ण कीजिए: (२)

  1. संसार में - 
  2. जीवन में - 
  3. व्यवस्था में - 
  4. व्यवहार में -

(२) निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए शब्दों के समानार्थी शब्द लिखिए: (२)

  1. ढेर -
  2. धारदार - 
  3. शोषक -
  4. उपहास -

(३) ‘समाजसेवा ही ईश्वरसेवा है’ इस विषय पर अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए। (२)


निम्नलिखित पठित परिच्छेद पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक पैराग्राफ मैंने पढ़ा है। वह उनके अपने ही संबंध में है :'' मैं खुली सड़क पर कोड़े खाने से इसलिए बच जाता हूँ कि लोग मेरी बातों को दिल्लगी समझकर उड़ा देते हैं। बात यूँ है कि मेरें एक शब्द पर भी वे गौर करें, तो समाज का ढाँचा डगमगा उठे।"

‘‘वे मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकते, यदि मुझपर हँसें नहीं। मेरी मानसिक और नैतिक महत्ता लोगों के लिए असहनीय है। उन्हें उबाने वाली खूबियों का पुंज लोगों के गले के नीचे कैसे उतरे? इसलिए मेरे नागरिक बंधु या तो कान पर उँगली रख लेते हैं या बेवकूफी से भरी हँसी के अंबार के नीचे ढँक देते हैं मेरी बात।’’ शॉ के इन शब्दों में अहंकार की पैनी धार है, यह कहकर हम इन शब्दों की उपेक्षा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें संसार का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सत्य कह दिया गया है।

संसार में पाप है, जीवन में दोष, व्यवस्था में अन्याय है, व्यवहार में अत्याचार... और इस तरह समाज पीड़ित और पीड़क वर्गों में बँट गया है। सुधारक आते हैं, जीवन की इन विडंबनाओं पर घनघोर चोट करते हैं। विडंबनाएँ टूटती-बिखरती नजर आती हैं पर हम देखते हैं कि सुधारक चले जाते हैं और विडंबनाएँ अपना काम करती रहती हैं।

आखिर इसका रहस्य क्या है कि संसार में इतने महान पुरुष, सुधारक, तीर्थंकर, अवतार, संत और पैगंबर आ चुके पर यह संसार अभी तक वैसा-का-वैसा ही चल रहा है। इसे वे क्यों नहीं बदल पाए? दूसरे शब्दों में जीवन के पापों और विडंबनाओं के पास वह कौन-सी शक्ति है जिससे वे सुधारकों के इन शक्तिशाली आक्रमणों को झेल जाते हैं और टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर नहीं जाते?

शॉ ने इसका उत्तर दिया है कि मुझपर हँसकर और इस रूप में मेरी उपेक्षा करके वे मुझे सह लेते हैं। यह मुहावरे की भाषा में सिर झुकाकर लहर को ऊपर से उतार देना है।

शॉ की बात सच है पर यह सच्चाई एकांगी है। सत्य इतना ही नहीं है। पाप के पास चार शस्त्र हैं, जिनसे वह सुधारक के सत्य को जीतता या कम-से-कम असफल करता है। मैंने जीवन का जो थोड़ा-बहुत अध्ययन किया है, उसके अनुसार पाप के ये चार शस्त्र इस प्रकार हैं:-

उपेक्षा, निंदा, हत्या और श्रद्धा।

1. कृति पूर्ण कीजिए।  (2)

(i) पाप के चार हथियार यें हैं-

           

(ii) जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का कथन -

2.                             (2)

  1. महत्ता - ______
  2. सत्य - ______
  3. दिलगी - ______
  4. अध्ययन - ______

3. निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर 40 से 50 शब्दों में लिखिए:  (2)

समाज सुधारक समाज में व्याप्त बुराइयों की पूर्णत: समाप्त करने मेंविफल रहे। इस पर अपने विचार स्पष्ट कीजिए।


निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:

सुधारक होता है करुणाशील और उसका सत्य सरल विश्वासी। वह पहले चौंकता है, फिर कोमल पड़ जाता है और तब उसका वेग बन जाता है शांत और वातावरण में छा जाती है सुकुमारता।

पाप अभी तक सुधारक और सत्य के जो स्तोत्र पढ़ता जा रहा था, उनका करता है यूँ उपसंहार "सुधारक महान है, वह लोकोत्तर है, मानव नहीं, वह तो भगवान है, तीर्थंकर है, अवतार है, पैगंबर है, संत है। उसकी वाणी में जो सत्य है, वह स्वर्ग का अमृत है। वह हमारा वंदनीय है, स्मरणीय है, पर हम पृथ्वी के साधारण मनुष्यों के लिए वैसा बनना असंभव है, उस सत्य को जीवन में उतारना हमारा आदर्श है, पर आदर्श को कब, कहाँ, कौन पा सकता है?’’ और इसके बाद उसका नारा हो जाता है, "महाप्रभु सुधारक वंदनीय है, उसका सत्य महान है, वह लोकोत्तर है।"

यह नारा ऊँचा उठता रहता है, अधिक-से-अधिक दूर तक उसकी गूँज फैलती रहती है, लोग उसमें शामिल होते रहते हैं। पर अब सबका ध्यान सुधारक में नहीं; उसकी लोकोत्तरता में समाया रहता है, सुधारक के सत्य में नहीं, उसके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अर्थों और फलितार्थों के करने में जुटा रहता है। 

अब सुधारक के बनने लगते हैं स्मारक और मंदिर और सत्य के ग्रंथ और भाष्य। बस यहीं सुधारक और उसके सत्य की पराजय पूरी तरह हो जाती है।

पाप का यह ब्रह्मास्त्र अतीत में अजेय रहा है और वर्तमान में भी अजेय है। कौन कह सकता है कि भविष्य में कभी कोई इसकी अजेयता को खंडित कर सकेगा या नहीं?

  1. संजाल पूर्ण कीजिए:      [2]
     पाप के अनुसार सुधारक यह है;
     
     
     
     
  2.  निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए:         [2]
      1. पुण्य - 
      2. विष - 
      3. असत्य - 
      4. जय - 
  3. किसी एक समाज सुधारक के बारे में अपने विचार ४० से ५० शब्दों में लिखिए।   [2]    

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