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'मेरा यह सेतु-रूपी शरीर काँपता हुआ निर्जन और निरर्थक रह गया है।'- इसे 'कनुप्रिया' के आधार पर स्पष्ट कीजिए। -

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Question

'मेरा यह सेतु-रूपी शरीर काँपता हुआ निर्जन और निरर्थक रह गया है।'- इसे 'कनुप्रिया' के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

Long Answer

Solution

'कनुप्रिया' डॉ. धर्मवीर भारती रचित एक बेजोड़ अनूठी और अद्भुत कृति है। यह राधा और कृष्ण के प्रेम और महाभारत की कथा से संबंधित कृति है। राधा के अनुसार प्रेम हीं सर्वोपरि है। श्रीकृष्ण महाभारत कें युद्ध के महानायक हैं। उन्होंने युद्ध का अवलंब क्यों किया है ? राधा ने उनसे सिर्फ प्रेम और प्रणय का ज्ञान लिया हैं उनके साथ चरम तन्मयता के क्षण उसने गुजारे हैं। और वहीं कनु अर्थात्‌ कृष्ण महाभारत के युद्ध के महानायक बनें। इसलिए राधा के अनुसार प्रेम से लेकर युद्ध के मैदान तक उन्होंने राधा को ही सेतु बना दिया है। कृष्ण नीचे की घाटी से ऊपर के शिखरों पर चले गए, परन्तु बली राधा की चढ़ी है, उसके प्रेम की बलि चढ़ी है, ऐसे राधा को लगता है। राधा के अनुसार उसके ही सिर पर पैर रखकर उसकी बाँहों से श्रीकृष्ण उसको प्रेम, प्रेमरूपी इतिहास ले गए हैं। वे जो राधा के साथ तन्मयता के क्षण जीये हैं, उस क्षणों से उस क्षेत्र से उठकर युद्ध क्षेत्र तक की अलंध्य दूरी तय करने के लिए श्रीकृष्ण ने कनुप्रिया (राधा) को ही सेतु बनाया है, ऐसे राधा को लगता है। इसलिए राधा कहती हैं कि इन शिखरों और मृत्यु - घाटियों के बीच बने सोने के पलके और गुँथे हुए तारों से बने पुल की तरह उसका यह सेतु-रूपी शरीर काँपता हुआ निर्जन और निरर्थक रह गया है।

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कनुप्रिया
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