Advertisements
Advertisements
Question
महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
Solution
1919-1947 ई० के काल का भारतीय इतिहास में विशेष स्थान है। इसी काल में एक महान् विभूति महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह, असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे अस्त्र-शस्त्रों के साथ भारतीय रणनीति में प्रवेश किया और शीघ्र ही राष्ट्रीय आंदोलन के कर्णधार बन गए। 1919 से स्वतंत्रता प्राप्ति तक महात्मा गाँधी ही भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्रबिंदु बने रहे। गाँधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप परिवर्तित हो गया और इसने जन संघर्ष का रूप धारण कर लिया। जनवरी, 1915 ई० में गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौट आए थे। दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष ने गाँधी जी को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नेतृत्व सँभालने के लिए तैयार कर दिया। दक्षिण अफ्रीका में प्राप्त की गई सफलताओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि शांतिपूर्ण अवज्ञा और सत्याग्रह के द्वारा विरोधी पक्ष को आंदोलन की माँगें स्वीकार करने को बाध्य किया जा सकता है।
दक्षिण अफ्रीका में दीनहीन भारतीयों पर होने वाले अन्याय के विरुद्ध संघर्षशीलता ने गाँधी जी को विश्वास दिला दिया कि भारतीय जनता को देश की स्वतंत्रता जैसे महान् उद्देश्य के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल संघर्ष छेड़ने और इस हेतु बलिदान देने के लिए तत्पर किया जा सकता है। दक्षिण अफ्रीका में प्राप्त की गई सफलताओं ने जनशक्ति के महत्त्व को स्पष्ट कर दिया। अतः भारत लौटने पर गाँधी जी ने देश की बहुसंख्यक कृषक जनता को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित किया और उसे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से जोड़ा। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित सत्याग्रह नामक नवीन संघर्ष प्रणाली का विकास किया था। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सच्चाई पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। गाँधी जी का संपूर्ण जीवन-दर्शन सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था।
वह अहिंसा को प्रेम का स्वरूप मानते थे। उनको विश्वास था कि अहिंसा में सभी समस्याओं के निराकरण की अद्भुत शक्ति विद्यमान है। गाँधी जी की दृष्टि में अहिंसा कायरता और दुर्बलता की नहीं अपितु वीरता, दृढ़ता और निडरता की प्रतीक है। केवल निडर, वीर और दृढ़प्रतिज्ञ व्यक्ति ही इसका भली-भाँति प्रयोग कर सकते हैं। गाँधी जी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। वह सिद्धांत की अपेक्षा व्यवहार पर अधिक बल देते थे और साधनों की पवित्रता और श्रेष्ठता में विश्वास करते थे। उनका विचार था कि अच्छे साध्य की प्राप्ति के लिए साधन भी श्रेष्ठ होने चाहिए। गाँधी जी का जनसामान्य की संघर्ष शक्ति में दृढ़ विश्वास था। वे साम्राज्य की शक्ति का सामना मूक जनशक्ति द्वारा करना चाहते थे।
उनका विचार था कि केवल जमींदारों, डॉक्टरों अथवा वकीलों के प्रयत्नों से देश को स्वतंत्र नहीं कराया जा सकता। देश की स्वतंत्रता के लिए जनसामान्य को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में लाना नितांत आवश्यक था। वह महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्रदान करना चाहते थे और उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में सम्मिलित करना चाहते थे। हिंदू-मुस्लिम एकता, छुआछूत विरोधी संघर्ष और देश की महिलाओं की सामाजिक स्थिति को सुधारना, गाँधी जी के तीन महत्त्वपूर्ण लक्ष्य थे। गाँधी जी ने सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा के सिद्धांत पर आधारित संघर्ष की अपनी नवीन विधि का प्रयोग करके राष्ट्रीय आंदोलन को जनसामान्य को आंदोलन बना दिया। 1917-18 ई० की अवधि में गाँधी जी ने चम्पारन और खेड़ा के सत्याग्रहों में भाग लिया तथा अहमदाबाद के मिल मजदूरों की माँगों के समर्थन में संघर्ष किया।
1 अगस्त, 1920 ई० को। गाँधी जी ने औपनिवेशिक प्रशासन के विरुद्ध असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया। मार्च 1930 ई० को उन्होंने विरोध के प्रतीक के रूप में नमक का चुनाव करके सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ कर दिया और अगस्त 1942 ई० में भारत छोड़ो’ आंदोलन प्रारंभ करके अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया। गाँधी जी के भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेने से भारतीय राष्ट्रवाद का स्वरूप परिवर्तित होने लगा। हमें याद रखना चाहिए कि गाँधी जी के जन अनुरोध में किसी भी प्रकार का छल-कपट नहीं था। उनके कुशल संगठनात्मक गुणों ने भारतीय राष्ट्रवाद के आधार को और अधिक व्यापक बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। भारत के भिन्न-भिन्न भागों में कांग्रेस की नई शाखाओं को खोला गया। रजवाड़ों अर्थात् देशी राज्यों में राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन देने के लिए ‘प्रजामंडलों’ की स्थापना की गई। गाँधी जी ने राष्ट्रवादी भावनाओं के प्रसार तथा राष्ट्रवादी संदेश के संचार के लिए शासकों की भाषा के स्थान पर मातृभाषा का चुनाव किया। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की प्रांतीय समितियाँ ब्रिटिश भारत की कृत्रिम सीमाओं पर नहीं अपितु भाषायी क्षेत्रों के आधार पर स्थापित की गई थीं।
इन भिन्न-भिन्न उपायों ने देश के दूरवर्ती भागों में राष्ट्रवाद के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इनके परिणामस्वरूप वे सामाजिक वर्ग भी राष्ट्रवाद का महत्त्वपूर्ण भाग बन गए, जो अभी तक इससे अछूते रहे थे। किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने हजारों की संख्या में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेना प्रारंभ कर दिया। गाँधी जी के नेतृत्व में छेड़े गए असहयोग आंदोलन में छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, हिंदू-मुसलमान, उदारपंथी, रूढ़िवादी सभी समान रूप से सम्मिलित हुए। इसी प्रकार सविनय अवज्ञा आंदोलन में जनसामान्य ने महत्त्वपूर्ण भाग लिया। दिल्ली में लगभग 1600 महिलाओं ने शराब की दुकानों पर धरना दिया। इस प्रकार भारत छोड़ो आंदोलन वास्तविक अर्थों में एक जन आंदोलन बन गया।
इसमें सामान्य भारतीयों ने लाखों की संख्या में भाग लिया। सामान्य भारतीयों के साथ-साथ कुछ अत्यधिक संपन्न व्यापारी एवं उद्योगपति भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थक बन गए। वे यह बात भली-भाँति समझ गए कि स्वतंत्र भारत में वे लाभ उनके हो जाएँगे, जो आज उनके अंग्रेज प्रतिद्वन्द्वियों की झोली में जा रहे थे। परिणामस्वरूप, जी०डी० बिड़ला जैसे कुछ सुप्रसिद्ध उद्योगपति राष्ट्रीय आंदोलन का खुला समर्थन करने लगे, जबकि कुछ अन्य उद्योगपति इसके मूक समर्थक बन गए। इस प्रकार, कांग्रेस के अनुयायियों एवं प्रशंसकों में गरीब किसान और उद्योगपति दोन्में ही सम्मिलित थे। इस प्रकार गाँधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन वास्तविक अर्थों में एक आंदोलन बन गया।