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मुझे आज भी वह संध्या नहीं भूलती जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति को मैंने सामान्य आसन पर बैठकर दिन भर के उपवास के उपयंत्त केवल कुछ उबले आलू खाकर पारायण करते देखा। -

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Question

निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए-

मुझे आज भी वह संध्या नहीं भूलती जब भारत के प्रथम राष्ट्रपति को मैंने सामान्य आसन पर बैठकर दिन भर के उपवास के उपयंत्त केवल कुछ उबले आलू खाकर पारायण करते देखा। मुझे भी वही खाते देखकर उनकी दृष्टि में संतोष और ओठों पर बालकों जैसी सरल हँसी छलक उठी। जीवन मूल्यों की परख करने वाली दृष्टि के कारण उन्हें देशरत्न की उपाधि मिली और मन की सरल स्वच्छता ने उन्हें अजातशत्रु बना दिया। अनेक बार प्रश्न उठता है, “क्या वह साँचा टूट गया जिसमें ऐसे कठिन कोमल चरित्र ढलते थे ?”

(1) कृति पूर्ण कोजिए-  (2)

(2) (i) समानार्थी शब्द परिवर्तन करके वाक्य फिर से लिखिए।  (1)

वह संध्या नहीं भूलती।

(ii) निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए विलोम शब्द ढूँढ़कर लिखिए:  (1)

  1. मरण × ______
  2. प्रातः × ______

(3) प्रथम राष्ट्रपति की चरित्रगत विशेषताएँ क्या थीं? 25 से 30 शब्दों में लिखिए।  (2)

Answer in Brief
Chart
One Word/Term Answer

Solution

(1) 

(2) (i) वह संध्या नहीं भूलती।

(ii) 

  1. मरण × जीवन
  2. प्रातः × संध्या

(3) डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनका मन विशाल था, जो देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। जो एक महान भारतीय स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ साथ भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेता और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख अध्यक्ष भी थे।

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अनोखे राष्‍ट्रपति
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