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‘नदी के मन के भाव’ इस विषय पर भाषण तैयार करके प्रस्‍तुत कीजिए । - Hindi - Composite [हिंदी - संयुक्त]

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Question

‘नदी के मन के भाव’ इस विषय पर भाषण तैयार करके प्रस्‍तुत कीजिए ।

Answer in Brief

Solution

मैं नदी हूँ। मेरा जन्म पर्वतमाला की गोद तथा प्राणियों के कल्याण के लिए हुआ हैं। एक स्थान पर बैठना तो मुझे आता ही नहीं। हमेसा चलते रहना मेरा काम है। तथा प्राणियों के कल्याण द्वारा पहाड़ो, जंगलो, कंकणों से संघर्ष करके आगे बढ़ती हु। और जब मनुष्य तथा प्राणी जिव जंतु और बड़े शहरो के लोग इस जल का सेवन करते है तब मुझे यह देखकर बहोत गर्व महसूस होता हैं। मैंने अपने जीवन में हमेशा आगे बढ़ना सीखा है। एक स्थान पर बैठना मुझे आता नहीं। मैं बड़े-बड़े पथरो को तोड़ती हूँ; धकेलती हुई रस्ता बनाते हुए हमेशा आगे बढ़ती हूँ। कर्म ही मेरा विश्वाश है।

मुझमे सीवर, औद्योगिक कचरा, थैलियाँ आदि बहोत तरह के कूड़ा डाला जाने लगा इससे मैं ही प्रदूषित नहीं हुई बल्कि मेरे आस - पास की भूमि भी प्रदूषित और बंजर हो गई है। नदी किसी को कष्ट देना नहीं चाहती पर अधिक बरसात होने पर उसमे बाढ़ आ जाती है और उसके किनारे बस्ती पानी में डूब जाती है, खेती बह जाती है, उस समय बहोत लोगो को तकलीफ सहनी पड़ती है।

मुझे इस बात से ख़ुशी होती है की उस पर जगह - जगह बाँध बनाकर खेती में सिंचाई जल उपयोग किया जाने लगा है।

मुझमे गंदगी तथा औद्योगिक कूड़ा कचरा छोड़ने वालो को दंडनीय अपराध माना जाए और कानून तोड़ने वालो को कठोर दंड दिया जाए अगर ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले समय में बाढ़ सूखा जल संकट, भूमि प्रदूषित ही नहीं बल्कि इससे प्राकृतिक आपदाएं भी आने की संभावना हो सकती है।

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नदी की पुकार
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Chapter 1.1: नदी की पुकार - स्वाध्याय [Page 2]

APPEARS IN

Balbharati Hindi (Composite) - Lokvani Class 9 Maharashtra State Board
Chapter 1.1 नदी की पुकार
स्वाध्याय | Q 1 | Page 2
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