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नगर के सबसे बड़े सेठ से जब किसी ने साधु का जिक्र किया, तो वह अविश्वास से हँस पड़ा। बोला, “ऐसे ढोंगी जाने यहाँ कितने आते रहते हैं!” और वह अपने कारोबार में लग गया। - Hindi - Composite [हिंदी - संयुक्त]

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Question

निम्नलिखित पठित गद्यांश पढ़कर दी गई सूचनाओं के अनुसार कृतियाँ कीजिए:

नगर के सबसे बड़े सेठ से जब किसी ने साधु का जिक्र किया, तो वह अविश्वास से हँस पड़ा। बोला, “ऐसे ढोंगी जाने यहाँ कितने आते रहते हैं!” और वह अपने कारोबार में लग गया। साधु का नाम चारों ओर फैलता जा रहा था। साधु भी कभी-कभी सोचता कि अब फिर बहुरूपिया जीवन में लौटने में क्या रखा है, क्‍यों न इसी जीवन में अपनी जिंदगी लगा दी जाए। फिर उसका मन धिक्कारने लगता कि वह जिंदगी भर साधु बना रहा, तो अपने असली पेशे के साथ बेईमानी करेगा। इसी सोच-विचार में उसके दिन निकलने लगे।

एक बार सेठ की पत्नी बहुत बीमार हो गई। दुनिया भर के इलाज कराए गए, वैद्य-डॉक्टर बुलाए, लेकिन सेठानी की तबीयत ठीक ही नहीं हुई। उसे लगता था कि वह अब नहीं बचेगी। मित्रों और शुभचिंतकों ने सलाह दी कि एक बार उस साधु को दिखा देने में क्या हानि है। हारकर सेठ तैयार हो गया।

(1) आकलन:

लिखिए:     [2]

(2) शब्द संपदा:

  1. निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द गद्यांश सें ढूँढ़कर लिखिए:    [1]
    1. विश्वास × ______
    2. लाभ × ______
  2. उपसर्ग तथा प्रत्यययुक्त शब्द तैयार कर लिखिए:      [1]
    उपसर्गयुक्त शब्द   मूल शब्द   प्रत्यययुक्त शब्द
    ........... मान  ...........

(3) स्वमत अभिव्यक्ति:     [2]

‘रोगियों की सेवा ही ईश्वर सेवा है’ इस विषय पर अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।

Comprehension

Solution

(1) 

(2)

    1. विश्वास × अविश्वास
    2. लाभ × हानि 
  1. उपसर्गयुक्त शब्द   मूल शब्द   प्रत्यययुक्त शब्द
    सम्मान मान  माननीय

(3) यह माना जाता है कि हर इंसान में ईश्वर का अंश होता है, इसलिए हर जीव में ईश्वर का स्वरूप देखा जा सकता है। इस कारण उनकी सेवा करना भगवान की पूजा के समान माना जाता है। विशेष रूप से वे लोग, जो असहाय और बीमार हैं, उन्हें सेवा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। कई बीमार लोग ऐसे होते हैं, जिनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। ऐसे रोगियों की सेवा करना अत्यंत पुण्य का कार्य है। जब उनकी सेवा की जाती है और उनके चेहरों पर मुस्कान आती है, तो उसमें ईश्वर की छवि दिखाई देती है। इसी भावना को समझते हुए कई लोगों ने अपने पूरे जीवन को रोगियों की सेवा में समर्पित कर दिया है और इसे उन्होंने भगवान की भक्ति का एक रूप माना है।

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