'आत्मपरिचय' कविता में कवि ने व्यक्ति और समाज के गहरे संबंध को रेखांकित किया है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो समाज में रहकर अपना जीवन व्यतीत करता है। समाज के बिना मनुष्य की कल्पना संभव नहीं है। कवि ने कहा है कि दुनिया को जानना सरल है, लेकिन स्वयं को जानना उतना ही कठिन। समाज में रहकर मनुष्य को खट्टे-मीठे अनुभव मिलते हैं और उसकी पहचान भी समाज के माध्यम से ही होती है। समाज में सुख-दुःख का संतुलन बना रहता है। कवि ऐसे जीवन की कामना करता है जो प्रेम और आनंद से परिपूर्ण हो।
कवि का संसार के साथ एक विशेष आत्मीय संबंध है। कवि स्वयं को दुनिया को समझने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया में देखता है। वह प्रेम, आनंद, और शांति से भरे जीवन की कामना करता है, जिसमें मानवीय मूल्यों और संबंधों का महत्व हो। कवि आत्म-जागरूकता और समरसता का संदेश देता है।