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Question
प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?
Solution
केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों अर्थात् प्रांतों के अधिकारों के प्रश्न पर भी संविधान सभा में पर्याप्त बहस हुई। संविधान सभा के कुछ सदस्य शक्तिशाली केन्द्र के समर्थक थे, जबकि कुछ अन्य सदस्य प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों के पक्ष में थे। ऐसे सदस्यों द्वारा प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में अनेक महत्त्वपूर्ण तर्क दिए गए। संविधान के मसविदे में तीन सूचियों-केंद्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची–को बनाया गया था। केन्द्रीय सूची के विषय केवल केंद्र सरकार और राज्य सूची के विषय केवल राज्य सरकारों के अधीन होने थे। समवर्ती सूची के विषय केंद्र और राज्य दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी थे। उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय सूची में बहुत अधिक विषयों को रखा गया था। इसी प्रकार प्रांतों की इच्छाओं की कोई परवाह न करते हुए समवर्ती सूची में भी बहुत अधिक विषयों को रख दिया गया था।
मद्रास के सदस्य के० सन्थनम ने राज्य के अधिकारों की पुरजोर वकालत की। उन्होंने न केवल प्रांतों अपितु केन्द्र को भी शक्तिशाली बनाने के लिए शक्तियों के पुनर्वितरण की आवश्यकता पर बल दिया। उनका तर्क था कि आवश्यकता से अधिक जिम्मेदारियाँ होने पर केन्द्र प्रभावशाली रूप से कार्य करने में समर्थ नहीं हो पाएगा। केंद्र के कुछ दायित्वों में कमी करके उन्हें राज्य सरकारों को सौंप देने से अधिक शक्तिशाली केंद्र का निर्माण किया जा सकता था। सन्थनम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह दलील देना कि “संपूर्ण शक्तियाँ केंद्र को सौंप देने से वह शक्तिशाली हो जाएगा” केवल एक गलतफहमी है। सन्थनम का तर्क था कि शक्तियों का विद्यमान वितरण विशेष रूप से राजकोषीय प्रावधान, प्रांतों को पंगु बनाने वाला था। इसके अनुसार भू-राजस्व के अतिरिक्त अधिकांश कर केंद्र सरकार के अधिकार में थे। इस प्रकार, धन के अभाव में राज्यों में विकास परियोजनाओं को कार्यान्वित करना संभव नहीं था। शक्तियों के प्रस्तावित वितरण के विषय में सन्थनम ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं ऐसा संविधान नहीं चाहता जिसमें इकाई को आकर केंद्र से यह कहना पड़े कि ‘मैं अपने लोगों की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर सकता।
मैं उन्हें साफ-सफाई नहीं दे सकता, मुझे सड़कों में सुधार और उद्योगों की स्थापना के लिए खैरात दे दीजिए।’॥ प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में के० सन्थनम का तर्क था कि केन्द्रीय नियंत्रण में बहुत अधिक विषयों को रखे जाने तथा बिना सोचे-समझे शक्तियों के प्रस्तावित वितरण को लागू किए जाने के परिणाम अत्यधिक हानिकारक होंगे, इसके परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में सारे प्रांत केन्द्र के विरुद्ध विद्रोह’ पर उतारू हो जाएँगे। प्रांतों के अनेक अन्य सदस्य भी चाहते थे कि प्रांतों को अधिक शक्तियाँ प्रदान की जाएँ। मैसूर के सर ए० रामास्वामी मुदालियार भी प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में थे। उनका विचार था कि संविधान में शक्तियों के अत्यधिक केंद्रीयकरण के परिणामस्वरूप ‘केंद्र बिखर जाएगा। ऐसे सदस्यों ने समवर्ती सूची एवं केंद्रीय सूची में कम-से-कम विषयों को रखे जाने पर बल दिया। | इस प्रकार प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने के पक्ष में अनेक तर्क प्रस्तुत किए गए।