English

राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्वों की पहचान कीजिए। - History (इतिहास)

Advertisements
Advertisements

Question

राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्वों की पहचान कीजिए।

Long Answer

Solution

मुगलों के राजत्व सिद्धांत का वास्तविक प्रस्फुटन सम्राट अकबर के शासनकाल में हुआ। अकबर के उत्तराधिकारी जहाँगीर ने पर्याप्त सीमा तक उसके द्वारा प्रतिपादित राजत्व सिद्धांत का ही अनुकरण किया। शाहजहाँ धीरे-धीरे अकबर की नीति से हटने लगा। शाहजहाँ के उत्तराधिकारी औरंगजेब ने इस नीति का परित्याग करके राजत्व के विशुद्ध इस्लामी आदर्श का अनुसरण किया। मुगलों की राजकीय विचारधारा का निर्माण सम्राट अकबर के परम मित्र और वैचारिक सहयोगी अबुल फ़ज़ल द्वारा किया गया था।

विद्वानों के विचारानुसार इस पर राजतंत्र के तैमूरी ढाँचे और सुप्रसिद्ध ईरानी सूफ़ी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1191 ई० में मृत्यु) के विचारों का प्रभाव था। शिहाबुद्दीन के विचारानुसार प्रत्येक व्यक्ति में एक दिव्य चमक (फ़र-ए-इज़ादी) है, किंतु केवल उच्चतम व्यक्ति ही अपने युग के नेता हो सकते हैं। अबुल फ़ज़ल द्वारा प्रतिपादित राजत्व सिद्धांत के मूल में भी यही विचारधारा निहित थी।

  • राजत्व के मुग़ल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्व इस प्रकार थेः
  1. राजपद का दिव्य सिद्धांत-
    सभी मुग़ल सम्राट राजपद के दिव्य सिद्धांत में विश्वास करते थे। उनका विचार था कि यह पद सर्वोच्च शक्ति द्वारा व्यक्ति विशेष को ही प्रदान किया जाता था। मुग़ल दरबार के इतिहासकारों ने अनेक साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि मुग़ल बादशाहों को शक्ति सीधे ईश्वर से प्राप्त हुई थी। उनके द्वारा वर्णित एक दंतकथा में यह बताया गया कि मंगोल रानी अलानकुआ अपने शिविर में आराम करते समय सूर्य की एक किरण द्वारा गर्भवती हुई थी। उसने जिस संतान को जन्म दिया उस दिव्य प्रकाश का प्रभाव था। यह प्रकाश पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित । होता रहा।
    राजत्व के दिव्य सिद्धांत की व्याख्या करते हुए अबुल फ़ज़ल ने लिखा था, “राजा एक सामान्य मानव से कहीं अधिक है; वह पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है, ईश्वर का रूप है, और उसे एक सामान्य मनुष्य की अपेक्षा बुद्धि-विवेक का ईश्वरीय वरदान अधिक मात्रा में प्राप्त होता है। उसके अनुसार, “राज्य-शक्ति ईश्वर से फूटने वाला प्रकाश और सूर्य से निकलने वाली किरण है।” राजपद के इसी सिद्धांत के कारण मुग़ल सम्राट स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझते थे। अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब आदि सभी ने ‘जिल्ल-ए-इलाही’ अर्थात् ‘ईश्वर की छाया’ की उपाधि धारण की थी। राजपद के इस दैवी सिद्धांत ने मुग़ल सम्राटों की शक्ति में वृद्धि की तथा जन-सामान्य में सम्राट पद के प्रति आदर-सम्मान तथा श्रद्धा की भावनाएँ उत्पन्न कीं।
  2. चित्रों द्वारा दिव्य सिद्धान्त के विचार का संप्रेषण- उल्लेखनीय है कि इतिवृत्तों के विवरणों के साथ चित्रित किए जाने वाले चित्रों ने इन विचारों के सम्प्रेषण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। ये चित्र देखने वालों के मन-मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव डालते थे। 17वीं शताब्दी से मुग़ल कलाकार बादशाहों को प्रभामंडल के साथ चित्रित करने लगे। उन्होंने ईश्वरीय प्रकाश के प्रतीक रूप इन प्रभामंडलों को ईसा और वर्जिन मेरी के यूरोपीय चित्रों में देखा था।
  3. धर्म और राजनीति में पृथक्कीकरण- मुग़ल राजत्व सिद्धांत में धर्म और राजनीति में पृथक्कीकरण स्थापित करने का प्रयास किया गया। अकबर को राजनीति में उलेमा वर्ग का अनुचित हस्तक्षेप पसंद नहीं था। वह उलेमा वर्ग के प्रभाव को समाप्त करके अपनी शासन-नीति को जन-हितैषी सिद्धांतों के आधार पर संचालित करना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने सितंबर 1579 ई० में ‘निर्भूत घोषणा’ (महज़र) की उद्घोषणा की। इस घोषणा के अनुसार सम्राट को कुरान की व्याख्या संबंधी उठने वाले विवादास्पद विषयों में अंतिम निर्णय लेने वाली सर्वोच्च सत्ता के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
  4. सुलह-ए-कुल की नीति का अनुसरण- राजत्व के मुग़ल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्वों में सुलह-ए-कुल की नीति का महत्त्वपूर्ण स्थान था। राज्य के लौकिक स्वरूप को स्वीकार करना तथा धार्मिक सहनशीलता की नीति का अनुसरण करना मुगलों के राजत्व सिद्धान्त की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। अबुल फ़ज़ल के अनुसार सुलह-ए-कुल (पूर्ण शान्ति) का आदर्श प्रबुद्ध शासन की आधारशिला था। सुलह-ए-कुल में सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी; शर्त केवल यही थी कि वे न तो राजसत्ता को हानि पहुँचाएँगे और न आपस में झगड़ेंगे।
    औरंगजेब के अतिरिक्त प्रायः सभी मुग़ल सम्राट धार्मिक दृष्टि से उदार एवं सहनशील थे, अतः उन्होंने राजपद के संकीर्ण इस्लामी सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए अपनी हिन्दू और मुस्लिम प्रजा को समान अधिकार प्रदान किए। अकबर वह पहला मुस्लिम शासक था, जिसने धर्म एवं जाति के भेद-भावों का त्याग करके अपनी समस्त प्रजा के साथ समान एवं निष्पक्ष व्यवहार किया। उसका विचार था कि शासक को प्रत्येक धर्म और जाति के प्रति समान रूप से सहनशीलता | होना चाहिए।
  5. राज्य-नीतियों के माध्यम से सुलह-ए-कुल के आदर्श को लागू करना- मुग़ल शासकों ने सुलह-ए-कुल के आदर्श को राज्य-नीतियों के माध्यम से लागू किया। मुगलों ने अपने अभिजात वर्ग (अमीर वर्ग) में ईरानी, तूरानी, अफ़गानी, राजपूत, दक्कनी आदि सभी अमीरों को सम्मिलित करके उसे एक मिश्रित रूप प्रदान किया। इन सबको पद और पुरस्कार प्रदान करते हुए उनकी जाति अथवा धर्म को नहीं अपितु राजा के प्रति उनकी सेवा और निष्ठा को ध्यान में रखा गया। अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर और 1564 ई० में जज़िया को समाप्त कर यह सिद्ध कर दिया कि उसका शासन धार्मिक पक्षपात पर आधारित नहीं था।
    साम्राज्य के अधिकारियों को भी स्पष्ट निर्देश दे दिए गए थे कि वे प्रशासन में ‘सुलह-ए-कुल’ के नियमों का अनुपालन करें। उपासना-स्थलों के रख-रखाव व निर्माण के लिए सभी मुग़ल बादशाहों द्वारा अनुदान प्रदान किए गए। यद्यपि औरंगजेब के शासनकाल में गैर-मुस्लिम प्रजा पर पुनः जज़िया लगा दिया गया था, किंतु, समकालीन स्रोतों से यह पता लगता है कि शाहजहाँ और औरंगजेब के शासनकाल में यदि युद्धकाल में मंदिरों को नष्ट कर दिया जाता था, तो बाद में उनकी मरम्मत के लिए
    अनुदान जारी कर दिए जाते थे।
  6. न्यायपूर्ण संप्रभुता सामाजिक अनुबंध के रूप में-
    अबुल फ़ज़ल के विचारानुसार संप्रभुता राजा और प्रजा के मध्य होने वाली एक सामाजिक अनुबंध था। बादशाह अपनी प्रजा के चार सत्त्वों-जीवन (जन), धन (माल), सम्मान (नामस) और विश्वास (दोन) की रक्षा करता था और इसके बदले में वह प्रजा से आज्ञापालन तथा संसाधनों में भाग की माँग करता था। केवल न्यायपूर्ण संप्रभु ही शक्ति और दैवी मार्गदर्शन के साथ इन अनुबंधों का सम्मान करने में समर्थ हो पाते थे।
    अकबर का विचार था कि एक राजा या शासक अपनी प्रजा का सबसे बड़ा शुभचिंतक एवं संरक्षक होता है। उसे न्यायप्रिय, निष्पक्ष एवं उदार होना चाहिए; अपनी प्रजा को अपनी संतान के समान समझना चाहिए और प्रतिक्षण प्रजा की भलाई के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। अकबर के उत्तराधिकारियों ने भी प्रजा-हित के इस सिद्धांत को अपने राजत्व संबंधी विचारों का प्रमुख आधार बनाए रखा।
  7. प्रतीकों द्वारा न्याय-विचार का दृश्य रूप में निरूपण करना- न्याय के विचार का दृश्य रूप में निरूपण करने के लिए अनेक प्रतीकों की रचना की गई। मुग़ल राजतंत्र में न्याय के विचार को सर्वोत्तम सद्गुण माना जाता था। शांतिपूर्वक एक-दूसरे के साथ चिपटकर बैठे हुए शेर और बकरी अथवा गाय कलाकारों द्वारा प्रयुक्त सर्वाधिक लोकप्रिय प्रतीक था। इसका उद्देश्य राज्य को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में दिखाना था, जहाँ दुर्बल और सबल सभी पारस्परिक सद्भाव से शांतिपूर्वक रह सकते थे। सचित्र ‘बादशाहनामा’ के दरबारी दृश्यों में इस प्रतीक का अंकन बादशाह के सिंहासन के ठीक नीचे बने एक ओले में किया गया है। नि:संदेह मुग़लों का राजत्व सिद्धांत पर्ववर्ती मुस्लिम शासकों के राजत्व सिद्धांत की अपेक्षा अधिक उदार एवं निष्पक्ष था।
shaalaa.com
राजधानियाँ और दरबार
  Is there an error in this question or solution?
Chapter 9: शासक और विभिन्न इतिवृत्त - अभ्यास [Page 253]

APPEARS IN

NCERT History [Hindi] Class 12
Chapter 9 शासक और विभिन्न इतिवृत्त
अभ्यास | Q 9. | Page 253
Share
Notifications

Englishहिंदीमराठी


      Forgot password?
Use app×